छत्तीसगढ़बिलासपुर

शायद लोगों की प्यास बुझाने से भी जरूरी है आचार संहिता का पालन ,लोग प्यासे क्यों न मर जाए, लेकिन चुनाव और उसके नियमो का पालन करना सर्वोपरि

एक तरफ जल संकट है तो दूसरी ओर आदर्श आचार संहिता। इन दोनों पाटों में बिलासपुर के लोगों का पीसना इस बार तय हैसत्याग्रह डेस्क

गर्मी अपने शबाब पर है। प्रचंड गर्मी के साथ पेयजल संकट भी बिलासपुर में गहराता जा रहा है। जिस रफ्तार से सूरज का तापमान बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से पानी रसातल में जा रहा है। बिलासपुर में पिछले दो-तीन सालों से यही कहानी दोहराई जा रही है । गर्मी आते ही शहर में पेयजल का संकट मुंह बाए खड़ा हो जाता है, लेकिन प्रशासनिक अक्षमता की वजह से पहले से इसकी तैयारी नहीं की जाती। पिछले साल तो फिर भी गर्मी भर नए-नए बोर खोदने और उस से जलापूर्ति का प्रयास किया गया था, लेकिन इस बार वह भी मुमकिन नहीं हो पाएगा। बिलासपुर में हर दिन 53 एमएलडी पानी की जरूरत पड़ती है। इसके लिए 21 पानी टंकी और 524 पावर पंप से शहर में पेयजल की सप्लाई होती है। यानी बिलासपुर पेयजल के लिए पूरी तरह भूजल पर निर्भर है। यही वजह है कि गर्मी के दिनों में भूजल स्तर 180 से लेकर 200 और कहीं कहीं तो 300-400 फिट तक नीचे चला गया है। शहर में ऐसे भीइलाके हैं जहां इस बार 600 फीट में भी पानी नहीं मिल रहा है । पिछले साल के जल संकट से सबक लेते हुए इस साल नगर निगम द्वारा शहर के उन स्थानों पर 20 नए ट्यूबवेल का खनन कराया गया था जहां जल संकट देखा गया था। कुछ स्थानों पर तो जनवरी-फरवरी से ही जल संकट गहराने लगा था , जिसे देखते हुए नगर निगम द्वारा बिलासपुर के विनोबा नगर, बंधवा पारा, तोरवा, चिंगराजपारा , राष्ट्रीय पाठशाला, राजकिशोर नगर , चांटीडीह, कुदुदंड पंप हाउस समेत 20 जगहों पर नए ट्यूबवेल खनन कराए गए हैं ,लेकिन नगर निगम की लापरवाही और सुस्त चाल की वजह से ट्यूबवेल खनन के बाद यहां से जलापूर्ति शुरू नहीं की गई। इंतजार इस बात का था कि जब क्षेत्र के दूसरे नलकूप फेल होंगे तब इन्हें शुरू किया जाएगा। इसलिए इनमे पावर पंप तक नहीं लगाए गए थे। जबकि अधिकारी जानते थे कि मार्च में कभी भी आदर्श आचार संहिता लग सकती है, फिर भी गफलत करते हुए ऐसा होने दिया गया। अब आचार संहिता लग जाने से इन 20 बोरवेल में पावर पंप लगाने का काम फंस गया है। यानी लोकसभा चुनाव के परिणाम आने से पहले तक ऐसा करना मुमकिन नहीं होगा। जाहिर है इस बार परिणाम 23 मई के भी बाद आ सकते हैं यानी पूरा मई चुनावी प्रक्रिया में ही निकल जाएगा।चुनाव खत्म होते-होते तक तो पूरी गर्मी ही निकल जाएगी, फिर इन ट्यूबवेल का क्या लाभ लोगों को मिलेगा। अब हालात बेकाबू होने पर बिलासपुर नगर निगम जल विभाग के अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी से पावर पंप के लिए वर्क ऑर्डर की अनुमति लेने के मकसद से उनके आगे पीछे घूम रहे हैं। नगर निगम द्वारा ट्यूबवेल के खनन का प्रस्ताव काफी पहले भेजा गया था, जिसकी स्वीकृति के बाद फरवरी मार्च महीने में इनका खनन कराया गया । अगर पहले से तैयारी की गई होती तो फिर पावर पंप की भी व्यवस्था उसी समय हो सकती थी । नलकूप में पावर पंप ना होने की वजह से पानी उपलब्ध होने के बावजूद बोरवेल से पानी की सप्लाई मुमकिन नहीं होगी। भले ही शहर में जल संकट कितना भी बड़ा क्यों ना हो, लोग बूंद बूंद पानी को तरस कर प्यासे क्यों न मर जाए, लेकिन नियम का पेंच कुछ ऐसा है कि चाह कर भी निगम के अधिकारी कुछ नहीं कर सकते। ऐसा लगने लगा है कि जिस आदर्श आचार संहिता को देश और जनता की भलाई के लिए लागू किया गया था, वही हम बिलासपुर के लोगों के गले का फांस बन रहा है। विभागों के बीच समन्वय ना होने से नियमों का हवाला देकर ऐसा करने से रोका जा रहा है । फिलहाल अगर आचार संहिता हटने के बाद पावर पंप की फिटिंग की भी जाती है तब भी लगभग गर्मी तो निकल ही जाएगी ,जबकि पानी की सबसे अधिक जरूरत अप्रैल मई और जून के पहले पखवाड़े में ही होती है। आने वाले दिनों में इन वार्डों में भी पुराने पंप सूख जाएंगे और फिर लोगों के घर जल आपूर्ति बंद हो जाएगी।तब लोगों का गुस्सा नगर निगम और जिला प्रशासन पर टूटेगा। उस समय शायद आचार संहिता की बहानेबाजी से बात बनेगी नहीं। चुनावी साल में ऐसी गलती होनी नहीं चाहिए थी, लेकिन हो चुकी है। आने वाले कुछ दिन बिलासपुर के लिए त्रासदी भरे हो सकते हैं। अजीब विडंबना होगी कि नए बोरवेल उपलब्ध होने के बावजूद केवल सबमर्सिबल पंप ना लगे होने की वजह से लोगों को इस गर्मी पानी उपलब्ध नहीं हो पाएगा। नगर निगम, अमृत मिशन योजना पर भी काम कर रहा है, लेकिन उसमें कम से कम 1 साल तो लगना ही है। इसलिए बड़ी चिंता यह है कि इस बार की गर्मी बिलासपुर में कैसे निकलेगी। एक तरफ जल संकट है तो दूसरी ओर आदर्श आचार संहिता। इन दोनों पाटों में बिलासपुर के लोगों का पीसना इस बार तय है।

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