
भुवनेश्वर बंजारे

बिलासपुर – जोनल रेल्वे प्रबंधन ने अपनी सारी हदें पार कर दी है। जिन कोरोना वारियर्स को सम्मानित करना चाहिए, उन्हें ही रेल्वे के अधिकारी बेघर करने आतुर है। रेल्वे का यह अमानवीय चेहरा देख आप भी दंग रह जाएगे। इस तस्वीर में नजर आने वाली यह वही बेटियां है जिनके सिर से रेल्वे ने छत छीन ली है। कभी जिनके हाथों ने रेल्वे के कर्मवीरों सहित संभाग के हजारों जिंदगियों को मौत के मुंह से निकाला था। आज उन्ही हाथों को ठुकराने का षड्यंत्र रेल्वे के अफसर कर रहे है। यह कोई और नही रेल्वे हॉस्पिटल के मेडिकल स्टाफ है। जिन्हें कोविड के आतंक को रोकने दो सालों के कॉन्ट्रेक्ट पर कोविड ड्यूटी के लिए न्यायधानी बुलाया गया था। जिन्हें पेमेंट के साथ सारी सुविधा उपलब्ध कराने का दावा रेल्वे ने किया था। लेकिन जैसे जैसे कोविड के मामले थमने लगे है। वैसे वैसे रेल्वे प्रबंधन अपने वादों को दरकिनार कर रहे है। इस मामले में नर्सिंग स्टाफ ने बताया कि कोरोना ड्यूटी के दौरान कम्युनिस्ट स्प्रेड ना हो इसके लिए हर संस्था द्वारा मेडिकल स्टाफ को रहने और ट्रैवलिंग की अलग से व्यवस्था दी जाती है। इसी तरह से रेल्वे प्रशासन ने भी रेल्वे स्टेशन के पास ही कोविड के 70 स्टाफ को सर्व सुविधा उपलब्ध कराई थी। लेकिन रेल्वे प्रबंधन ने बिना किसी जानकारी के अप्रैल माह की सैलरी से 70 स्टाफ के खाते से करीब 7 लाख वेतन की कटौती कर दी है। वही रेल्वे ने एक आदेश जारी कर एक जून को मेडिकल स्टाफ को आवासीय और यात्रा भत्ता नही देने की बात कहते हुए,,उनके खिलाफ रिकवरी करने के निर्देश दे दिए है। इसके बाद अब उन्हें बिना अल्टीमेटम के दो टूक रेल्वे के विंध्याचल रेस्ट हाउस से चले जाने कहा गया है। जिससे रेल्वे हॉस्पिटल में काम करने वाले कोरोना वॉरियर्स लाख सम्मान पाने के बाद भी अपने आप को असहाय महसूस कर रहे है। ऐसे में वह चिंतित भी है कि आखिर वह अब कहाँ रहेगे। बिना किसी विकल्प और बिना सूचना के किए गए इस कार्यवाही से रेल्वे के मेडिकल स्टाफ में काफी रोष का मौहोल व्याप्त हो रहा है। विडंबना यह भी है कि कोविड ड्यूटी के बाद आखिर कौन सा मकान मालिक उन्हें घर आने के लिए मंजूरी देगा। इन समस्याओं के लिए वह रेल्वे के विभाग प्रमुख के पास भी जा चुके है। लेकिन वहाँ भी उनके हाथ मायूसी ही लगी है। लिहाजा अब वह जिला प्रशासन से ही न्याय की उम्मीद कर रहे है। कोरोना महामारी के बीच रेल्वे के मेडिकल स्टाफ द्वारा कर्मठता से काम किया गया है। जिसके गवाह सभी मरीज है कि किन परिस्थितियों में इन कोरोना वारियर्स ने अपनी जान की परवाह किए बगैर सेवा भाव से कोविड मरीजों का इलाज किया है। ऐसे में सवाल यह है? कि क्या रेल्वे इतनी कंगाल हो गई है कि उन्हें कोरोना वारियर्स के हक पर डाका डालना पड़ रहा है या ऐसी स्थिति में लिया जा रहा यह निर्णय सही है।
रेल्वे मंत्री से लगाई न्याय की गुहार…
रेल्वे कोविड हॉस्पिटल में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ ने हाउस एलाउंस के भुगतान कर चुके राशि को वेतन से वसूल करने के मामले में रेल्वे मंत्री पीयूष गोयल से शिकायत की है। उन्होंने रेल्वे प्रबंधन द्वारा रेस्ट हाउस से निकाले जाने के निर्देश की जानकारी देते हुए रेल्वे मंत्री से न्याय की गुहार लगाई है।
सीपीआरओ ने रखा अपना पक्ष,, सुविधा या भत्ता दोनो साथ मिलना मुश्किल…
रेल्वे सीपीआरओ साकेत रंजन से जब मामले में बात की गई तो उन्होंने बताया कि नियमानुसार किसी भी स्टॉफ को हाउस रेंट अलाउंस तभी दिया जाता है जब वह शासकीय आवास का उपयोग नहीं करता और किराया या निजी मकान में रहते है। उसी तरह वाहन अलाउंस में भी यही नियम लागू होता है। लेकिन रेल्वे ने इन्हें रहने के लिए आवास और आने जाने के लिए वाहन की सुविधा उपलब्ध कराई थी। इसके बाद भी संविदा वाले पैरामेडिकल स्टॉफ ने अलाउंस के लिए आवेदन किया और उसे वेतन के अलावा इसका भूगतान भी हो गया। जो नियम के अनुसार सही नहीं है। ऐसे में अब रेलवे ने स्पष्ट किया है कि उन्हें या तो अलाउंस का भूगतान किया जाएगा या रहने और आने जाने की सुविधा दी जाएगी।