
उदय सिंह
बिलासपुर – मस्तूरी विकासखंड के ग्राम पंचायत दर्राभांठा में शासकीय भूमि के उपयोग को लेकर बड़ा प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। एक ओर ग्राम पंचायत मनरेगा के तहत स्वीकृत नए तालाब (डबरी) निर्माण को ग्रामीणों की जरूरत बताते हुए काम शुरू कराने की मांग कर रही है, वहीं दूसरी ओर रेशम पालन विभाग इसी भूमि को वर्षों से विकसित किए गए तसर खाद्य पौधरोपण प्रक्षेत्र के रूप में संरक्षित रखने पर अड़ा हुआ है। मामला अब जिला कलेक्टर के जनदर्शन तक पहुंच गया है।

ग्राम पंचायत दर्राभांठा के सरपंच एनल धृतलहरे ने कलेक्टर को दिए आवेदन में कहा है कि गांव में जल संकट की स्थिति को देखते हुए ग्रामीणों की मांग पर मनरेगा के तहत नया तालाब स्वीकृत हुआ था। लेकिन रेशम पालन के नाम पर इस कार्य पर रोक लगा दी गई है, जिससे मनरेगा श्रमिकों और ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। पंचायत ने मांग की है कि तालाब निर्माण पर लगी रोक हटाई जाए तथा रेशम पालन के लिए आरक्षित खसरा नंबर 78, रकबा 20 हेक्टेयर भूमि का आरक्षण निरस्त कर पंचायत को उपलब्ध कराया जाए।
वहीं रेशम विभाग का पक्ष पूरी तरह अलग है।

विभाग द्वारा जनपद पंचायत मस्तूरी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को भेजे गए पत्र में दावा किया गया है कि खसरा नंबर 78 की 20 हेक्टेयर भूमि पर वर्ष 2017 से तसर खाद्य पौधरोपण एवं क्षेत्रीय सुधार कार्य किया गया है। विभाग के अनुसार इस परियोजना में लगभग 82 हजार पौधे लगाए गए, 16 हजार 952 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ और हजारों स्थानीय परिवारों को आजीविका के अवसर मिले। पत्र में यह भी उल्लेख है कि पौधे अब लगभग छह फीट की ऊंचाई तक विकसित हो चुके हैं और उनके संरक्षण तथा संवर्धन पर पिछले वर्षों में लाखों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। विभाग का कहना है कि ग्राम पंचायत द्वारा हाल ही में शुरू किया गया डबरी निर्माण कार्य लगभग 5 हजार पौधों को प्रभावित कर सकता है, जिससे कई वर्षों की मेहनत और सरकारी निवेश नष्ट होने का खतरा है। विभाग ने यह भी तर्क दिया है कि विकसित तसर क्षेत्र स्थानीय पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। इस पूरे मामले ने शासन की दो महत्वपूर्ण योजनाओं मनरेगा और रेशम विकास परियोजना को आमने-सामने ला खड़ा किया है।

दोनों ही योजनाओं में सरकारी धन खर्च हुआ है और दोनों का उद्देश्य ग्रामीण विकास तथा रोजगार सृजन है। लेकिन अलग-अलग विभागों द्वारा एक ही भूमि पर अधिकार और उपयोग का दावा किए जाने से टकराव की स्थिति निर्मित हो गई है। अब नजर जिला प्रशासन पर टिकी है। कलेक्टर को तय करना होगा कि जल संरक्षण और मनरेगा रोजगार को प्राथमिकता दी जाए या फिर वर्षों से विकसित तसर पौधरोपण परियोजना को संरक्षित रखा जाए। प्रशासन का फैसला न केवल करोड़ों रुपये के सरकारी निवेश की दिशा तय करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि एक ही भूमि पर दो सरकारी योजनाओं के टकराव का समाधान किस प्रकार निकाला जाएगा।