मुंगेली

स्कूल की छत का प्लास्टर गिरा, बाल बाल बचे बच्चे, दुर्घटना के बाद भी आंखें मूंदे बैठा शिक्षा विभाग

आकाश दत्त मिश्रा

जिस तरह सरहद की रक्षा के लिए देश का सैनिक अपनी जान हथेली पर रखकर रोज अपनी ड्यूटी पर जाता है उसी तरह मुंगेली सेतगंगा विकासखंड के माराड़बरा शासकीय प्राथमिक शाला के बच्चे भी रोज स्कूल अपनी जान हथेली पर लेकर पहुंचते हैं। इन जांबाज बच्चों में पढ़ाई के प्रति लगन ही वह वजह है जिसके चलते तमाम अव्यवस्थाओं का सामना करते हुए भी वे लगातार स्कूल आ रहे हैं ।

सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे तमाम अभियानों के माध्यम से शिक्षा को बढ़ावा देने का दावा करती है लेकिन कड़वी सच्चाई का सामना करने का नैतिक साहस भी शायद विभागों के पास नहीं है । सेतगंगा विकासखंड का प्राथमिक शाला लंबे अरसे से बेहद जर्जर भवन में संचालित हो रहा है । यही वजह है कि यहां छत का प्लास्टर भरभरा कर गिर पड़ा। यह गनीमत रही कि उस वक्त बच्चे मैदान में खेल रहे थे, नहीं तो यहां बड़ा हादसा होना तय था ।कक्षा में छत का प्लास्टर का बड़ा हिस्सा गिर जाने से पूरे स्कूल में दहशत का माहौल है ।जाहिर है अगर उस वक्त बच्चे वहां मौजूद होते तो उन्हें जानलेवा चोटे लगती। इस घटना के बाद से बच्चे और अभिभावक दोनों सहमे हुए हैं। बच्चे तो कक्षाओं में जाने तक को तैयार नहीं है और बरामदे में खड़े होकर स्कूल का समय व्यतीत करते उन्हें देखा जा सकता है। यहां तक कि स्कूल का स्टाफ भी संभावित दुर्घटना से भयभीत है। भ्रष्टाचार की दीमक पहले ही भवन की दीवारों और छतों को जर्जर कर चुकी है। रही सही कसर बारिश ने पूरी कर दी। पानी निकासी ना होने से पूरा भवन सीपेज की चपेट में है और इसी वजह से अक्सर छत का प्लास्टर इसी तरह से झर रहा है।

जिस स्थान पर से प्लास्टर गिरा है वहां अब सरिया नजर आने लगे हैं। डर यह है कि भवन के दूसरे हिस्से में भी इसी तरह की घटना ना हो जाए। जिस भवन में कक्षाएं संचालित हो रही है वह पूरी तरह जर्जर है और बारिश के इस मौसम में भवन के आसपास भी जलजमाव है ,जिसके चलते दुर्घटना की गहरी आशंका बनी हुई है । दरअसल स्कूल के चारों तरफ बेजा कब्जा कर लिया गया है, जिस कारण से वर्षा जल की निकासी नहीं हो पा रही और इसी कारण से भवन सीपेज की चपेट में आ गया है। पहले से ही जर्जर भवन में सीपेज होने के बाद जगह-जगह से प्लास्टर उखड़ने की शिकायत आ रही है । यहां बच्चे रोज जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने पहुंचते हैं। शिक्षा विभाग में इसकी शिकायत की गई है लेकिन स्कूल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। भविष्य के सुनहरे सपने संजोकर ग्रामीण बच्चे यहां विद्या अध्ययन के लिए आ तो रहे हैं लेकिन उनके साथ किसी भी वक्त यहां कोई हादसा हो सकता है। बच्चे अगर स्कूल का त्याग कर देंगे तो उनका भविष्य अंधकार मय हो जाएगा लेकिन स्कूल के जर्जर भवन में विद्या अध्ययन के दौरान भी कोई भी अनहोनी संभावित है। इसलिए दोहरी मार झेल रहे बच्चों में पढ़ाई को लेकर उत्साह धीरे-धीरे कम होने लगा है । शिक्षा विभाग के अधिकारियों को सभी स्तर पर इसकी जानकारी दे दी गई है लेकिन उनके द्वारा जांच और कार्यवाही का रटारटाया जवाब दिया जा रहा है। आरोप यह भी है कि मौजूदा सरकार द्वारा विभाग को नए भवन निर्माण के लिए फंड उपलब्ध नहीं कराया जा रहा जिस कारण से भी जर्जर भवन में कक्षाएं संचालित करना विभाग की मजबूरी है। लेकिन हालात ऐसे ही रहे तो फिर जाहिर है शाला त्यागी बच्चों की संख्या बढ़ेगी और फिर शिक्षा के अधिकार का संकल्प शायद ही पूरा हो पाएगा । अगर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली ऐसी ही रही तो फिर इन स्कूलों में कोई कैसे पढ़े और कैसे बढ़े ?

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