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हिंदू धर्म में गाय को पूजनीय और माता माना जाता है लेकिन बीते कुछ वर्षों में गाय विवाद का दूसरा नाम बन चूका है। गाय अगर सड़क पर हो तो विवाद, गाय अगर ट्रक पर हो तो विवाद, गाय बूचड़ खाने में हो तो विवाद और गाय खेत में उतर आए तो विवाद। गाय को लेकर रतनपुर में भी मंगलवार को तनाव की स्थिति पैदा हो गई । हाल ही में मध्य प्रदेश के एक जिले में फैसला लिया गया कि जो भी अपनी गाय को सड़क पर खुला छोड़ेगा उसे 6 महीने की कैद होगी।

शायद पूरे देश में ऐसा फैसला लेने का वक्त आ गया है। क्योंकि गाय को पालने वाले बेरहम लोग गाय का दूध निकालने के बाद उसे सड़क पर चरने नहीं मरने छोड़ देते है । लोग इन्हें आवारा मवेशी कहते हैं, लेकिन निरीह गाय को आवारा कहना शायद न्याय पूर्ण शब्द नहीं है। क्योंकि उन्हें ऐसा करने के लिए उनके मालिक विवश कर रहे हैं। लेकिन ऐसे ही खुले में घूम रहे गाय बैल लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन रहे हैं। जब गाय सड़क पर मौजूद होती हैं तो उनकी वजह से हादसे होते हैं और यही गाय अपनी भूख मिटाने खेतों में उतर आए तो फिर किसानों की खड़ी फसल चौपट होने लगती है। रतनपुर में भी यही हुआ। सत्तर अस्सी गाय किसानों के खेत में घुस गई और फसल को तबाह करने लगी । साल भर की कमाई का एकमात्र जरिया इस तरह बर्बाद होते देखकर करैहा पारा के किसानों ने सभी गायों को इकट्ठा किया और एक कमरे में उन्हें बंद कर दिया, फिर बाहर से दरवाजे पर ताला लगा दी ताकि खेत में लगी फसल सुरक्षित रहे । इधर करैहा पारा में एक कमरे में गायों को बंद करने की खबर महामाया गणेश उत्सव समिति के सदस्यों को लगी तो वे रात 10:00 बजे जूना शहर पहुंचे और कमरे में बंद गायो के भूखे प्यासे होने का हवाला देते हुए ताला तोड़कर गायों को आजाद कर दिया। आजाद होते ही सभी गाय एक बार वापस खेतों में जा घुसी और फसलों को चौपट करने लगी। एक बार फिर किसानों का गुस्सा आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने फिर से गायों को समेटा और उन्हें लेकर करैहा पारा ले गए और अपनी फसल गाय द्वारा बर्बाद करने पर विरोध जताने लगे। इसी बीच महामाया गणेश उत्सव समिति के लोग भी वहां पहुंच गए और दोनों पक्षों में विवाद की नौबत आ गई।

इधर घटना की सूचना पाकर मौके पर रतनपुर पुलिस पहुंची जिसने किसी तरह मामले को शांत कराया। एक पक्ष गाय द्वारा फसल को चौपट करने की दुहाई दे रहा है तो दूसरे पक्ष का तर्क है कि गायों को भूखा प्यासा 2 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया है जिससे गायों की स्थिति नाजुक होती जा रही है। देखा जाए तो दोनों के ही तर्कों में दम है। कोई भी किसान नहीं चाहेगा कि गाय उसके खेत में लगी फसल को तबाह करें और अगर आप ऐसा करने में उनकी सहायता करते हैं तो आप जाहिर तौर पर दोषी होंगे ही ,लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि निरीह गाय को भूखा प्यासा मरने के लिए कमरे में बंद कर दे । इस मामले में असल दोषी तो गाय पालने वाले हैं। वही हैरानी इस बात की है कि मुख्यमंत्री के महत्व कांक्षी नरवा गरवा घुरवा बारी योजना के बावजूद और जगह-जगह गोठान निर्माण के दावे के बाद भी गायों की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है ? देशभर में काऊ पॉलिटिक्स जारी है । इसमें लोगों का भला हो रहा है लेकिन गायों का सचमुच कुछ भी भला अब तक नहीं हुआ है और गाय को लेकर लोग आपस में एक दूसरे पर लाठी तान रहे हैं । जो गाय शांति और ममता की प्रतीक हुआ करती थी, वही आज हिंसा के लिए जिम्मेदार बनती जा रही है। सोचना होगा, इसमें कितना दोष गाय का है और कितना दोष गाय को लेकर राजनीति करने वाले और उन्हें पालने वालों का है ?
