
हरिशंकर पांडेय
मल्हार – ग्रामीण अंचलों में मेला एक उत्सव का अवसर होता है जहाँ विभिन्न प्रकार के सामान और मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते यही वह समय रहता है जब किसान अपनी फसल के परिश्रम से अर्जित फल का कुछ आनन्द अपने परिवार के साथ प्राप्त कर पाता है, ऐसे ही मेले का आयोजन सन 1935 से प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर्व के दिन से मल्हार में 15 दिवसीय मेला लगते आ रहा है।

जिसका इंतजार धर्मनगरी मल्हार के रहवासियों के साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोगो को भी रहता है। यह मेला उनके लिए इसलिए भी खास हो जाता है क्योंकि मेले में वे अपनी जरूरत के सामानों के अलावा शादी व्याह के लिए भी खरीददारी करते है क्योंकि यहां सभी तरह के दुकाने लगती है। परन्तु अब समय के साथ मेला स्थल सिमट कर रह गया है जिससे व्यापारियों को दुकान लगाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वही वसूली व अपनी आय बढ़ाने में व्यस्त नगर पंचायत के अधिकारी व नेताओ को इसकी कोई फिक्र ही नही है।

इस बार तो स्थिति बहुत ज्यादा खराब है व्यापारियों को दुकान लगाने लोगो से गुहार लगाना पड़ रहा है। इसके अलावा नए आने वाले दुकानदारों को जगह भी नही मिल पा रही है। जिसके कारण कई व्यापारी वापस हो रहे है। ऐसे में ऐतिहासिक मेले के अस्तित्व पर संकट के बादल नजर आने लगे है।

व्यापारियों से मेला व्यवस्था बनाने वालों का दुर्व्यवहार कोई नया मामला नही है, हाल के दिनों में इसकी शिकायत ज्यादा आ रही है। विगत 88 वर्षो से परम्परागत रूप से लगने वाला मेले का भविष्य क्या होगा यह समय ही बताएगा,,बहरहाल इस मामले पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मौन रहना समझ से परे है।