बिलासपुर

अपनों के ठुकराए लाचार बुजुर्गों की भी नहीं सुन रहा प्रशासन , एक छत की आस में पथरा गई आंखें

प्रवीर भट्टाचार्य

बुधवार को बिलासपुर कलेक्टर परिषद में इन लाचार , बेबस और व्यवस्था से हारे बुजुर्गों को जिसने भी देखा, उसकी आंखों में पानी उतर आया। लेकिन शायद जिला प्रशासन की आंखो का पानी सूख चुका है तभी तो अपने दरवाजे पर फरियाद लगाते यह बुजुर्ग उसे नजर नहीं आए और ना ही इन्हें देख कर उनका दिल पसीजा। जबड़ा पारा मैं रहने वाली माना बाई अपने 74 वर्षीय बुजुर्ग लाचार और हड्डी का ढांचा बन चुके पति साहेब सिंह छत्रिय को लेकर कलेक्ट्रेट इसलिए आई थी, ताकि उनके सर पर एक छत मिल सके। इसी आस में दोनों यहां घंटों साहब का इंतजार करते रहे लेकिन साहब नहीं आए।

ऐसा नहीं है कि इन बुजुर्गों का अपना कोई नहीं है, लेकिन मतलबी इस जहां में माता-पिता को भी पुराने फर्नीचर की तरह बाहर का रास्ता दिखा देने वाली संतान ने इन्हें 5 साल पहले ही दुत्कार कर अपने से अलग कर दिया था। तब से यह लोग जबड़ा पारा में किराए का मकान लेकर रह रहे थे, लेकिन अब तो वह आसरा भी छूट चुका है। कमाने से लाचार, आर्थिक रूप से बिल्कुल फक्कड़, बेसहारा बेघर हो चुके पति पत्नी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर की उम्मीद लेकर बिलासपुर कलेक्ट्रेट पहुंचे। यहां हर गुजरने वाला आदमी इन्हें साहब लगता था ,इसलिए बुजुर्ग माना बाई सब के आगे हाथ जोड़ती गिड़गिड़ाती, याचना करती नजर आई ताकि कोई तो उनकी सुन ले। लेकिन किसी ने उनकी फरियाद नहीं सुनी। जब मीडिया ने उनसे हाल-ए-दिल पूछा तो दिल का गुबार आंखों के रास्ते से आंसू बनकर छलक आए ।

बुधवार को जिले के कलेक्टर सरकारी दौरे पर गौरेला में थे, इसलिए माना बाई और उनके बुजुर्ग पति साहिब सिंह छतरी की मुलाकात उनसे नहीं हो पाई लेकिन अगर हो भी जाती तो क्या इनकी फरियाद सुनी जाती ? यह बड़ा सवाल है। हैरानी इस बात की होती है कि सरकार अरबों खरबों की योजना ऐसे ही लाचार और जरूरतमंदों के लिए तैयार की जाती है लेकिन योजना का लाभ इनको मिलता क्यों नहीं ? तो फिर सवाल उठता है कि आखिर योजना बनती किन के लिए है और मिलती किन्हें हैं ? अगर यह दोनों लाचार , प्रधानमंत्री आवास योजना के हकदार नहीं है तो फिर ऐसी योजना आखिर किन के लिए बनाई गई है और क्यों बनाई गई है ?

कलेक्ट्रेट पहुंचे बुजुर्ग और बेहद कमजोर साहिब सिंह की हालत ऐसी भी नहीं थी कि वे बैठ सके। वो कभी उठते, अपना दर्द बयां करते और फिर वहीं जमीन पर पसर जाते। यहां से गुजरने वाले संवेदनशील लोगों ने उनकी थोड़ी बहुत मदद जरूर की लेकिन असली मदद तो जिला प्रशासन ही कर सकता है । लेकिन पता नहीं उसमें अब इतनी संवेदनशीलता बची भी है कि नहीं कि वह अपने दरवाजे पर आए इस बुजुर्ग दंपति को पिता तुल्य मानकर एक छत मुहैया करा दे।

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