कोरबा

किसानो की दुर्दशा अपने ही पैसे बैंक से निकालने देना पड़ता है रिश्वत…. एसीबी ने ब्रांच मैनेजर और कैशियर को पकड़ा रंगे हाथों, सभी बैंकों में हालात एक जैसे

रमेश राजपूत

कोरबा – किसान हर जीवनशैली का आधार हैं, किसान हर सभ्यता और संस्कृति का वास्तिवक संरक्षक हैं। किसान बहुत थोड़े में संतोष करना सिखाता है तो साथ में अपनी हिम्मत से मनचाही तरक्की करने की राह भी दिखाता है। आज पैसे और सत्ता की अंधी दौड़ में भागने वालों को ये नहीं पता की वो अपनी ही नींव में तेजाब डाल रहे हैं। किसान का ना सोचने वाले और उसका शोषण करने वालों को शायद ये वहम है की इस सारी प्रकृति को वो ही चला रहे है। धान के कटोरा के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ प्रदेश के किसानों के शोषण की एक ऐसी कहानी कोरबा जिले में प्रकाश आई है। जो छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों में घट रही है। जहां अपने खून पसीने की कमाई को बैंक से निकालने के ऐवज में घूस के तौर पर मोटी रकम देना पड़ रहा है। इसी तरह का मामला कोरबा जिले के पाली स्थित जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्या० शाखा में सामने आया है। जहा एन्टी करप्शन ब्यूरो की टीम ने किसान को उसी के खाते से पैसे निकालकर देने के ऐवज में 5000 रुपए रिश्वत लेते ब्रांच मैनेजर और कैशियर को रंगे हाथों पकड़ा गया है। मिली जानकारी के अनुसार कोरबा जिले के ग्राम धंवरा डोंगरी बतरा निवासी रामनोहर यादव अपने सालभर की खून पसीने की कमाई कि 5 लाख रुपए उनके जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्या० शाखा पाली में जमा हुई थी।

जिसे निकालने के लिए वह जब बैंक पहुंचे तो अमित दुबे, ब्रांच मैनेजर एवं आशुतोष तिवारी, कैशियर द्वारा 5 लाख निकालने के ऐवज में किसान से 7500 रुपए रिश्वत मांगी गई। जिसकी शिकायत उन्होंने एन्टी करप्शन ब्यूरो में की। जिसके बाद उनकी टीम ने सोमवार को ट्रेप आयोजित किया गया। प्रार्थी किसान आरोपीगण को रिश्वत देने के लिये बैंक कार्यालय गया जहां आरोपीगण द्वारा सावधानी बरतते हुए, रिश्वती रकम न लेते हुए, 5 लाख रू० आहरण राशि से रिश्वती रकम 5000 रू० काटकर प्रार्थी को शेष राशि दी गई, जिस पर एसीबी की टीम द्वारा कार्यवाही कर कैशियर से रिश्वत की राशि बरामद की गई। घटना में दोनों आरोपियों की संलिप्तता पाए जाने से दोनों ही आरोपियों के विरूद्ध धारा 7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (यथासंशोधित अधिनियम 2018) के तहत गिरफ्तार किया गया है। गौरतलब है कि यह प्रदेश का पहला मामला नहीं है जहां किसान के हक पर पढ़े लिखे गवार अफसर डाका डाल रहे हो। जिसको लेकर शासन प्रशासन द्वारा सार्थक प्रयास की जरूर समझी जा रही है। क्योंकि शिक्षा और विकास से कम तालुकात रखकर भी अपने मेहनत के बलबूते अन्न का दान लोगो तक पहुंचाने में मशगूल किसानों को इतनी जानकारी ही नहीं होती है। कि उनकी सेवा में लगे अफसर ही उनके मेहनत की कमाई लूट रहे है। इसे भी वह अपनी नियती समझ किसान अपनाने मजूबर है। ऐसे में देखना होगा कि किसानों की इन बड़ी समस्या को प्रदेश के हुकमरान कब तक समाधान कर सकते है..??? या फिर किसान के उत्थान और विकास का मुद्दा हमेशा कि तरह केवल चुनावी राजनीति तक ही सिमट कर रह जाएगा.!

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