
जुगनू तंबोली
रतनपुर – पौराणिक एवं ऐतिहासिक नगरी रतनपुर मे पारंपरिक मांघी पूर्णिमा मेला का शुभारंभ पवित्र सरोवर दुलहरा जलाशय के तट से हुआ, जहां हजारों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाकर, दीपदान करते हुए ईश्वर एवं अपने पूर्वजों के प्रति भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इतनी सुदृढ़ परंपरा की नीव रखी थी। ज्ञात हो कि रतनपुर के ऐतिहासिक मांघी पूर्णिमा मेला जो यहां के राजा के 28 रानियो की सती होने के याद में प्रतिवर्ष मांघी पूर्णिमा को भरता है।इस ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन आज भी ग्रामिणो द्वारा पूरी श्रद्धा के साथ किया जा रहा है। विज्ञान कितना भी विकास कर ले लेकिन परंपरा एवं संस्कृति के मूल्यो से आगे नहीं बढ़ सकता इसका जीता जागता उदाहरण है.

रतनपुर का मांघी पूर्णिमा मेला जहां आज भी परंपरागत तरीकों से लोग इस मेले का आनंद लेते हैं सूर्योदय से पूर्व उठकर के पवित्र सरोवर में आस्था की डुबकी लगाकर दीपदान करते है। सनातन संस्कृति मे अन्न दान का बड़ा ही महत्व है इसलिए हजारों नर नारी जरूरतमंद एवं भिक्षुक गणो को जो वहा बैठे रहते हैं उनको अन्न दान करते हुए अपनी परंपरा का निर्वहन करते हैं। दुल्हारा जलाशय के तट पर लगने वाले इस मेले में सांस्कृतिक मूल्य एवं पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपराओ का जीवंत स्वरुप देखने को मिला हुआ जहां कुछ नर नारी अपने बच्चों का मुंडन करा रहे थे तो वहीं कुछ सत्यनारायण भगवान की कथा सुन रहे, थे तो वही सरोवर के तट पर बने संत शिरोमणि रविदास के मंदिर मे उनके अनुयायी उनके भजनो को गाते नजर आये।श्रध्दा भक्ति एवं आधुनिकता की इस त्रिवेणी को जिसने भी देखा वे मंत्रमुग्ध होकर इस पल को अपने मोबाइल मे कैद करते नजर आये।
सामाजिक समरसता का जीवन्त
उदाहरण

इस मेले में सामाजिक समरसता का अद्भुत नजारा देखने को मिला जहा बिना किसी भेदभाव के हजारों लोग ज्योत से ज्योत जलाते चलो की भावना से एकाकार होकर के अपनी मनोकामना की पूर्ति हेतु दीपदान करते नजर आये। रतनपुर मेले की सबसे बड़ी पहचान है यहां का उखरा जो गन्ने के रस और धान के लाई के मिश्रण से बनता है, जिसे प्रसाद स्वरूप यहां के लोग बड़े चाव से खाते है। कहते हैं रतनपुर मेला आए और जलेबी नही खाएं यह तो हो ही नहीं सकता हमारे रतनपुर मेले की ऐतिहासिक पहचान के रूप में जलेबी भी है जिसको छोटे-बड़े सभी खातेहै।। इतने सुख सुविधा होने के बावजूद भी मेले में हमारी जो परंपरागत चीजे है वो दिखती है. जो हमारे पूर्वजों द्वारा प्रारंभ किए गए सुदृढ परंपराओं की एक श्रृंखला है। जहां लकड़ी के खिलौने, लकड़ी की गाड़ी, तलवार, चना का होरा, हमारे मेले की पहचान है. हम कितने भी आगे बढ़ जाए लेकिन अपनी अपनी जड़ों से अलग नही हो सकते,यही इस मेले का संदेश है।