
जलाशय में मगरमच्छों को रोक पाना भी, ना तो जल संसाधन विभाग के लिए मुमकिन है और ना ही वन विभाग के लिए। इसलिए आतंक के साए में यहां के ग्रामीण हर वक्त रहने को शापित है

बिलासपुर प्रवीर भट्टाचार्य
खुटाघाट जलाशय एक तरफ जहां क्षेत्र की सिंचाई जरूरतों को पूरा कर रहा है वहीं यहां बड़े पैमाने पर मत्स्य पालन भी किया जा रहा है। इसी के साथ खुटाघाट जलाशय मगरमच्छों का भी बड़ा आश्रय है ।यहां बड़ी संख्या में मगरमच्छ मौजूद है। मगरमच्छों के इस प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने प्रशासनिक स्तर पर विशेष कुछ नहीं किया जाता, यही वजह है कि अक्सर मगरमच्छ जलाशय से निकल कर आसपास के इलाकों में पहुंच जाते हैं। ऐसा ही कुछ शनिवार को भी देखा गया। सुबह खुटाघाट के बड़ी नहर में लोगों ने एक विशालकाय मगरमच्छ को देखा ।मगरमच्छ की लंबाई करीब 8 फीट थी ।नहर का इस्तेमाल यहां के लोग निस्तारी के लिए भी करते हैं इसलिए नहर में मगरमच्छ को देख कर सबके होश उड़ गए और तुरंत वन विभाग को इसकी इत्तला दी गई ।जल्द ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और ग्रामीणों की मदद से मगरमच्छ को पकड़ने की कोशिश शुरू हो गई। इसके लिए एक बड़ी जाली मंगाई गई और ग्रामीणों की मदद से उस जाल में मगरमच्छ को पकड़ा गया।

मगरमच्छ को पकड़ने के पश्चात उसे सुरक्षित खुटाघाट जलाशय में पहुंचाने की चुनौती को पूरा करते हुए वापस मुख्य जलाशय में मगरमच्छ को छोड़ दिया गया ।वन विभाग के अनुसार पकड़े गए मगरमच्छ की आयु करीब 4 वर्ष बताई जा रही है। आपको बता दें कि पिछले कुछ समय में इसी बड़े नहर में आधे दर्जन के करीब मगरमच्छ मिल चुके हैं। कभी कभी भोजन की तलाश में भटक कर मगरमच्छ नहरों के रास्ते ग्रामीण इलाकों में पहुंच जाते हैं ।इससे दो तरफा खतरा है। एक तरफ जहां मगरमच्छ की वजह से ग्रामीणों को खतरा हो सकता है ,वही मगरमच्छों के शिकार होने की भी आशंका हर वक्त बनी रहती है ,लेकिन खुले जलाशय में मगरमच्छों को रोक पाना भी, ना तो जल संसाधन विभाग के लिए मुमकिन है और ना ही वन विभाग के लिए। इसलिए आतंक के साए में यहां के ग्रामीण हर वक्त रहने को शापित है।
