
एक करोड़ का हाइजेनिक फिश मार्केट सफेद हाथी साबित हुआ है यहां बमुश्किल 1 महीने ही कारोबारियों ने दुकान लगाया है

बिलासपुर प्रवीर भट्टाचार्य
सरकारी धन का किस तरह दुरुपयोग किया जाता है इसका जीता जागता उदाहरण देखना हो तो पावर हाउस चौक पर मौजूद हाइजेनिक फिश मार्केट से अच्छा उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता ।आज से करीब 2 साल पहले एक करोड़ रुपए से इसका निर्माण किया गया था, लेकिन अब यह शहर के लिए सफेद हाथी बन चुका है। बिलासपुर शहर में जगह जगह मछली और मुर्गा दुकान होने से शहर में बढ़ती गंदगी को देखते हुए लंबे वक्त से एक व्यवस्थित बाजार की जरूरत महसूस की जा रही थी ।राष्ट्रीय मत्स्यकी विकास बोर्ड ने निगम प्रशासन के समक्ष वाणी राव के महापौर कार्यकाल के दौरान योजना की शुरुआत की थी। इसके लिए पहले बृहस्पति बाजार के बगल में खाली भूखंड पर मछली बाजार बनाने का निर्णय लिया गया, फिर दयालबंद मधुबन के पास की जमीन तय हुई लेकिन आखिर कार तोरवा पावर हाउस के पास खाली पड़े बर्फ फैक्ट्री में हाइजेनिक फिश मार्केट बनाने पर सहमति बनी । इसके लिए करीब 1 करोड रुपए खर्च किए गए। दावा किया गया की हाइजेनिक फिश मार्केट में आसपास के सभी मछली और मुर्गा व्यापारियों को शिफ्ट किया जाएगा, वहीं शहर के थोक मछली के व्यापारी भी यही से कारोबार करेंगे। 20 दिसंबर 2016 को केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने विधिवत इसका शुभारंभ किया । शुरुआत में पुराना पावर हाउस चौक पर लगने वाले मछली व्यापारियों को यहां शिफ्ट किया गया। कुछ दिनों तक उन्होंने वहां कारोबार भी किया लेकिन जल्द ही सब वापस अपने टपरे में लौट आए। मछली व्यापारियों की शिकायत थी कि वहां कोई ग्राहक आता ही नहीं दिनभर ग्राहकों के इंतजार में मक्खी मारते रहते हैं। ऊपर से सुविधा के नाम पर लगे पंखों की वजह से मछली सूख जाती है

असल समस्या कारोबार का ना होना था एक तरफ नियम कायदा मान कर कुछ व्यापारी हाइजेनिक फिश मार्केट के अंदर व्यवसाय कर रहे थे तो वहीं शाम होते ही कुछ मछली बेचने वाले सड़क पर ही दुकान सजा लेते थे। अधिकांश ग्राहक सड़क से खरीदारी कर लेते और हाइजेनिक फिश मार्केट तक कोई जाता ही नहीं। कुछ ही दिनों में कारोबार ना होने से पूरी व्यवस्था चौपट हो गया और वापस दुकाने सड़क पर ही लगने लगी। करीब साल भर से ऐसे ही हालात है। सड़क पर दुकान लगने से एक तरफ जहां सड़क पर वाहन पार्क किए जा रहे हैं वहीं मछली और मुर्गा मटन की दुकान की वजह से यहां गंदगी और बदबू का आलम रहता है । एक करोड़ रुपए खर्च कर फिश मार्केट बनाने के बावजूद यह व्यवस्था शायद ही किसी को समझ में आ रही है। हैरानी इस बात की है कि प्रशासन और नगर निगम ने भी ऐसी कोई कोशिश नहीं की जिससे कि मछली व्यापारी वापस हाइजेनिक फिश मार्केट में जाकर व्यवसाय करें।

मछली व्यापारी अपना तर्क दे सकते हैं लेकिन शहर की सफाई व्यवस्था के मद्देनजर कानून का डंडा चलाना अनिवार्य है। नियम कायदे सबके लिए एक जैसे हैं। अगर मछली व्यापारी नियमानुसार फिश मार्केट में बैठेंगे तो ग्राहकों को भी मजबूरन उन तक आना होगा । पहले कोई एक मछली विक्रेता सड़क पर आता है फिर उसके पीछे पीछे सभी चले आते हैं। इसलिए इन पर नकेल कसने की जरूरत है। अगर यह नहीं करना था तो फिर एक करोड़ रुपए बर्बाद करने की क्या जरूरत थी। आज एक करोड़ के हाइजेनिक फिश मार्केट पर ताला लगा हुआ है। जनता द्वारा टैक्स में जमा किए गए पैसे का कैसा दुरुपयोग यहां हुआ है इसे आप समझ सकते हैं। हाइजेनिक मछली बाजार का गेट बंद है कमरों में ताले लगे हैं। मछली व्यापारी सड़क पर कारोबार कर रहे हैं और सरकार और सरकार के नुमाइंदे आंख मूंदे बैठे हैं।