छत्तीसगढ़

आखिर मुंगेली नगर पालिका अध्यक्ष की दौड़ में है कौन-कौन शामिल ?

आकाश मिश्रा

हालांकि निकाय चुनाव के लिए अभी तारीखों का ऐलान नहीं हुआ है , लेकिन अध्यक्ष और वार्ड पार्षद के आरक्षण के साथ ही चुनावी घमासान तेज हो चुका है। मुंगेली के चुनावी आसमान में भी कुछ दावेदार धूमकेतु की तरह चमक रहे हैं तो कुछ तारों की तरह मद्धिम और टिमटिमाते हुए अपने होने का एहसास पैदा कर रहे हैं। कोशिश यही है कि आलाकमान तक संदेश पहुंच जाए और टिकट उन्हें ही हासिल हो। साथ ही साथ जनता को साधने की कोशिशें भी शुरू हो चुकी है।एक तरफ प्रत्याशी अपने स्तर पर अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं तो वही चाय की दुकान से लेकर नुक्कड़ और सभी बैठकों में यही मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। कई दावे किए जा रहे हैं । दावों में ही सरकार बनाएं और उखाड़े जा रहे है। यही विश्लेषक अपने प्रत्याशियो को भी बिना चुनाव लड़े ही पदों पर भी काबीज कर रहे हैं। लेकिन इन्हीं बहसों के गुणा भाग से काफी कुछ समीकरण भी निकल कर सामने आ रहा है , जिसके आधार पर चुनावी पंडित प्रत्याशियों के चेहरे पर जमीन धुंध को हटाकर उनके चेहरों को देखने की कोशिश कर रहे हैं ।

मुंगेली की राजनीति भी अजीब सी है। यहां पुन्नूलाल मोहले के रूप में कई दशकों से भाजपा विधायक और सांसद का साम्राज्य रहा है , लेकिन निकाय के चुनाव में कांग्रेस हावी है। यह उलटफेर अच्छे-अच्छे विशेषज्ञों को भी समझ नहीं आती कि आखिर वही वोटर, स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अलग तरह से मतदान क्यों करती है।

मुंगेली जिले के 22 वार्डो के आरक्षण के बाद कई दावेदारों के सपने चकनाचूर हो गए तो वहीं कई दावेदारों के लिए उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। कुछ पुराने दावेदार इस बात पर निराशा कि आरक्षण के बाद अपने वार्ड से चुनाव लड़ने की काबिलियत वे खो चुके हैं, लेकिन उनकी यही निराशा कई लोगों के लिए अवसर बनकर सामने आई है। नगर पालिका अध्यक्ष का पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो चुका है, इसलिए सामान्य वर्ग के उन दावेदारों के चेहरे मुरझा गए हैं ,जो पिछले कई दशकों से नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव लड़ने का ख्वाब संजोए बैठे थे। ओबीसी आरक्षण के बाद सामान्य वर्ग के लिए अवसर खत्म हो चुका है इसलिए अब वे निकाय चुनाव में अपनी जमीन बचाने पार्षद पद के लिए दांव खेलने का मन बनाते देखे जा रहे हैं। एक बार आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होते ही मुंगेली में अध्यक्ष पद के लिए भी कई दावेदार सामने आए हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए इस बार कुछ परिवर्तन की गुंजाइश नजर नहीं आती ।

पूर्व अध्यक्ष अनिल सोनी इस बार भी कांग्रेस के प्रबल दावेदार हैं , क्योंकि वे मुंगेली में अजेय माने जाते हैं। लगातार तीन जीत हासिल करने वाले अनिल सोनी की दावेदारी को सबसे ऊपर माना जा रहा है। लेकिन पार्षद चुनाव में हैट्रिक लगा चुके अरविंद वैष्णव भी अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल है और उनकी दावेदारी की भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। पिछड़ा वर्ग से और भी कई दावेदार मैदान में हैं तो वही यह जंग भारतीय जनता पार्टी में भी कम नहीं है। पूर्व पार्षद युसूफ उपलेटा, मोहन मल्लाह, संजय गोस्वामी, युवा नेता विनोद यादव, आनंद देवांगन जैसो दावेदारों की लंबी फेहरिश्त हैं। पेशे से शिक्षक और जमीन के कारोबार में नाम और पैसा कमा चुके संतलाल सोनकर के विज्ञापन भी आजकल अखबारों में इसीलिए नजर आ रहे हैं क्योंकि वो भी अध्यक्ष बनना चाहते हैं । इसीलिए भी वे अचानक शहर के कई कार्यक्रमों में सक्रिय रुप से नजर भी आने लगे हैं। लेकिन इस बार यह संभावना भी है कि अध्यक्ष का चुनाव पार्षद करेंगे। ऐसे में केवल अध्यक्ष के लिए दावेदारी काफी नहीं है। ऐसे प्रत्याशियों को उन वार्डो का भी चुनाव करना होगा, जहां से जरूरत पड़ने पर वे पार्षद बतौर चुनाव जीत सके। कुछ दावेदारों का अपना वार्ड ,आरक्षण की वजह से छीन गया हैं, इसलिए वे अपने नजदीकी वार्ड में प्लेटफार्म बनाने की कोशिश में जुट गए हैं। इस साल निकाय चुनाव में भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल होना तय है। अभी से ही कुछ दावेदार और कुछ उनके समर्थक सोशल मीडिया पर हवाई किले बनाने में लग गए हैं। मुंगेली के एक धड़े का मानना है कि अगर कांग्रेस ने अध्यक्ष बतौर अनिल सोनी को उतारा तो उनकी जीत सुनिश्चित है , क्योंकि उनका अच्छा खासा जनाधार है और वे लगातार अध्यक्ष का तीन कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा भी कर चुके हैं। तो वहीं सभापति अरविंद वैष्णव की दावेदारी भी कमजोर नहीं है। कांग्रेस में और भी कई नाम सामने आएंगे लेकिन भाजपा दावेदारों की तो लंबी सूची है । जाहिर तौर पर इस बार भी कांग्रेस और भाजपा के बीच जबरदस्त मुकाबला देखने को मिलेगा । सत्ता परिवर्तन के बाद हालांकि आंशिक झुकाव कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रहा है लेकिन वोट स्विंग किस तरह होगा यह तो चुनाव प्रचार के दौरान ही काफी कुछ समझ में आएगा। कांग्रेस के लिए यह करो या मरो का अवसर है क्योंकि भाजपा कार्यकाल में भी उन्होंने अध्यक्ष की कुर्सी अपनी झोली में डाली थी और अब तो प्रदेश में उनकी सरकार है । तो वहीं भाजपा, विधानसभा चुनाव का बदला लेते हुए कांग्रेस के इस किले में सेंध लगाने की पूरी कोशिश करेगी । उम्मीद है कि नवरात्र के बाद यह घमासान और भी तेज होगा और नोटिफिकेशन जारी होते ही पार्टी प्रत्याशियों के नाम भी स्पष्ट करेगी । तब तक तो चाय की चुस्कियो के साथ हर कोई अपना दावेदार पेश करता रहेगा और इसी वजह से आजकल नुक्कड़ की सभी बैठकों में चाय के प्याले में तूफान नजर आ रही है।

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