मस्तूरी

ऐतिहासिक, पुरातात्विक संपदाओ का अकूत खजाना रखने वाला राज्य , गौरव शाली इतिहास को समेटे रखने वाले धरोहर… विश्व धरोहर दिवस 18 अप्रेल छत्तीसगढ़ के लिए संकल्प का दिवस होना चाहिए….

हरिशंकर पांडेय

मल्हार – पुरावैभव की नगरी मल्हार जहाँ के कण कण में पुरातन काल के निशान दिखाई देती है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक के प्रमाण यहां से प्राप्त हुए है। इस दौरान विभिन्न राजाओं के राजपाठ के सबूत भी उत्खनन से मिले है। साथ ही हजारो देवी देवताओं के विभिन्न पत्थरो से निर्मित प्राचीन अवशेष इस बात के गवाह है कि यहां का इतिहास हजारो वर्ष पुराना है। इसी तरह नगर के प्रसिद्ध माँ डिडनेश्वरी व भगवान पातालेश्वर मंदिर जिनका भव्य मंदिर इस बात के सबूत है कि मल्हार प्राचीनकाल में कितना समृद्ध व सुसज्जित रहा होगा। इन मंदिरों की मूर्तियां बरबस ही मन को भा जाती है इसके अलावा प्राचीन गढ़ की प्राकृतिक सुंदरता का नजारा मन को आनंदित कर देती है।

इसी तरह भीमकीचक मंदिर की भग्नावशेष प्राचीन कला को बयां करती है। पुराविदों के अनुसार मल्हार से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि मल्हार का इतिहास ईसा पूर्व एक हजार साल पहले से कलचुरी-मराठा काल तक का क्रमशः इतिहास मिलता है । जिसे प्रथम काल – ईसा पूर्व 1000 से मौर्य काल के पूर्व तक, दूसरा काल- मौर्य काल से सातवाहन-कुषाण काल तक ईसापूर्व 325 से 300 ईस्वी तक , तीसरा काल शरभपुरीय तथा सोमवंशी काल 300 से 650 ईसवी तक, चौथा काल- परवर्ती सोमवंशी काल 650 से 900 ईसवी तक, पांचवा काल- कलचुरी काल 900 से 13वीं शताब्दी तक और फिर बाद का छठाकाल के रूप में हम परवर्ती कलचुरी काल को निर्धारण कर सकते हैं। सबके बीच विडम्बना ये है कि इतनी अकूत संपदा होने के बावजूद भी बड़े स्तर पर प्रचारित प्रसारित का काम नही हुआ जिससे धरोहर स्थलों के विकास के काम पिछड़ गए।

अब इसे राजनीतिक उदासीनता कहें या फिर आम लोगो मे धरोहरों के प्रति प्रेम की कमी। पर अब हमारे इस धरोहर को सहेजकर रखने का समय आ गया है। जिसके लिए जनभागीदारी से जनांदोलन कर धरोहरों को बचाए रखने प्रयास करने होंगे। ऐतिहासिक, पुरातात्विक संपदाओ का अकूत खजाना रखने वाला राज्य , गौरव शाली इतिहास को समेटे रखने वाले धरोहर स्थलों में से किसी एक को 23 बरस हो गए राज्य बने, हम उनमें से एक को भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर पर्यटकों को वहां आकर्षित नहीं कर सके।

पूर्व सदस्य सलाहकार पर्यटन मंडल व सामाजिक सांस्कृतिक कार्यकर्ता अजय शर्मा कहते है कि उन्होंने जनभागीदारी से धरोहर संवारने का जनांदोलन तालागांव से शुरू किया था जिसका बेहतर प्रतिसाद मिला व अनेको विकास के काम हुए। इसी तरह मल्हार के माँ डिडनेश्वरी देवी मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार में विशेष योगदान देकर धरोहरों को संवारने सफल हुए। श्री शर्मा के जनांदोलन को प्रत्येक धरोहर व पुरातात्विक स्थल में निरंतर जारी रखने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद राज्य की जनता के मन में धर्म धरोहर और संस्कृति को लेकर ,विकास की चिंताएं बढ़ीं ,इसी दरमियान वीरान पड़े तालागांव से श्री शर्मा ने “”धरोहरों के पुनरुत्थान काल “”का नारा देकर तन मन धन देकर धरोहर संवारने जनांदोलन शुरू किया,

उनके इस आंदोलन को अपार जनसमर्थन मिला। इसका नतीजा यह हुआ कि जनभागीदारी के साथ शासन प्रशासन भी पीछे आई और चार साल यानी 2004 से 2008 के बीच सौंदर्यीकरण, जनसुविधा विकास आदि पर लगभग 12 करोड़ रुपए का विकास हुआ साथ ही साथ इक्के दुक्के पर्यटक की जगह हजारों की संख्या में घरेलू और अंतरराज्यीय पर्यटक पहुंचने लगे। मेला महोत्सव आदि में लोग उमड़ने लगे इसी बीच 2005,2006 में दिल्ली के गणतंत्र दिवस परेड झांकी में “”रूद्रशिव “”की विलक्षण प्रतिमा की प्रतिकृति दुनिया के सामने प्रदर्शित की गई श्री शर्मा ने 2006 में “”शिवबरात “”सांस्कृतिक यात्रा मोहभठा से निकाली पोला के पर्व में जिसमे हजारों की संख्या में भक्तों ने भाग लिया और यह देश भर में चर्चा का विषय बना।

अब यह परंपरा के रूप में आ गई । मल्हार डीडिन दाई मंदिर समिति के सदस्यों ने ताला से श्री शर्मा के अलग होने के बाद अपना सहयोगी बना लिया । यहां उनके आते ही जो स्वरूप आज मंदिर का है वह निर्माण शुरू हुआ ,अनेक विकास के द्वार खुले ,पुनर्प्राण प्रतिष्ठा दिवस 7 जून में उन्होंने आमूल चूल परिवर्तन लाया।

मंदिर परिसर को भव्य दिव्य बनाने कार्ययोजनाएं बनी। रतनपुर में सिद्धपीठ गिरिजाबंध हनुमानजी मंदिर निर्माण में भी श्री शर्मा ने हिस्सा लिया। प्राचीन धरोहर स्थलों के संरक्षण संवर्धन के लिए मान, अपमान, श्रमसाध्य कर्म की भट्ठी में तपना पड़ता है।

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