बिलासपुर

कृषि विज्ञान केंद्र में 16 वां गाजर घास जागरूकता सप्ताह आयोजित…गाजरघास-मुक्त परिसर सुनिश्चित करने की गई अपील

रमेश राजपूत

बिलासपुर – कृषि विज्ञान केंद्र में 16 वां गाजर घास जागरूकता सफ्ताह मनाया गया, जो 16 से 22 अगस्त तक चला,इस अभियान में कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख डॉ. एसपी सिंह,डॉ. शिल्पा कौशिक,डॉ.अमित शुक्ला,डॉ. डी कौशिक,पंकज मिंज,डॉ, निवेदिता पाठक, डॉ अंजुली मिश्रा,सुशीला ओहदार,डॉ. चंचला पटेल,और कृषि विज्ञान केंद्र के अन्य लोगो ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग किया,जिन्होंने बताया कि  गाजर घास यानी पार्थेनियम को देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों जैसे काग्रेस घास, सफेद टोपी, घटक चादनी, गधी बूटी आदि नामों से जाना जाता है। हमारे देश में 1955 में दृष्टिगोचर होने के बाद यह विदेशी खरपतवार लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुकी है। यह मुख्यतः खाली स्थानों, अनुपयोगी भूमियों, औद्योगिक क्षेत्रो, बगीचों, पार्को, स्कूलों, रहवासी क्षेत्रों, सहक तथा रेलवे लाइन के किनारों आदि पर बहुतायत में पायी जाती है। पिछले कुछ वर्षों से इसका प्रकोप सभी प्रकार की फसलों, सब्जियों एवं थानों में भी बढ़ता जा रहा है। वैसे तो गाजरपास पानी मिलने पर वर्ष भर फल-फूल सकती है परंतु वर्षा ऋतु में इसका अधिक अंकुरण होने पर यह एक भीषण खरतपतवार का रूप ले लेती है। गाजरघास का पौधा 3-4 महीने में अपना जीवन चक्र पूरा कर लेता है तथा एक वर्ष में इसकी 3-4 पीढ़ियां पूरी हो जाती है।गाजरघास से मनुष्यों में त्वचा संबंधी रोग (डरमेटाइटिस), एक्जिमा, एलर्जी, बुखार दमा आदि जैसी बीमारियाँ हो जाती है। अत्यधिक प्रभाव होने पर मनुष्य मृत्यु तक हो सकती है। पशुओं के लिए भी यह खरपतवार अत्याधिक विषाक्त होता है। गाजरपास के तेजी से फैलने के कारण अन्य उपयोगी वनस्पतियों खत्म होने लगती है। जैव विविधता के लिये गाजरपास एक बहुत बड़ा खतरा बनती जा रही है। इसके कारण फसलों की उत्पादकता बहुत कम हो जाती है। भारत में, यह फसली और गैर-फसली भूमि, शहर के आवासों, रेल और सड़क के किनारे और संस्थानों के परिसरों मे गंभीर समस्या बन चुका है। इस खरपतवार के प्रबंधन के लिए कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों को समस्या से निपटने के साथ-साथ स्वास्थ्य खतरों के बारे में जनता में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है भाकृअनुप खरपतवार अनुसंधान निदेशालय ने गाजरघास प्रबंधन और इसके उपयोग के लिए बहुत प्रभावी प्रौद्योगिकिया विकसित की है। इसके अलावा, यह “स्वच्छ भारत अभियान” की एक प्रमुख गतिविधि के रूप में अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है और इसलिए सभी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों को जल्द से जल्द “गाजरघास मुक्त परिसर सुनिश्चित करना चाहिए। निदेशालय द्वारा इस वर्ष 16-22 अगस्त तक पूरे देश में सोलहवे गाजरघास जागरूकता सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है। मैं विश्वविद्यालयों, संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों के सभी लोगों से “स्वच्छ भारत अभियान के एक घटक के रूप में इस गतिविधि में भाग लेने और “गाजरघास-मुक्त परिसर सुनिश्चित करने की अपील की गई है। वही इसके बचाव को लेकर भी अनेक उपाय बताए गए है ,

नियंत्रण के उपाय
1. जगह-जगह संगोष्ठया कर लोगों को गाजरघास के दुष्प्रभाव एवं नियंत्रण के बारे में जानकारी देकर उन्हें जागरूक करें।
2. वर्षा ऋतु में गाजरघास को फूल आने से पहले जड़ से उखाड़कर कम्पोस्ट एवं वर्मी कम्पोस्ट बनाना चाहिए।
3. वर्षा आधारित क्षेत्रों में शीघ्र बढ़ने वाली फसले जैसे ठेवा, ज्वार,
बाजरा, मक्का आदि की फसलें लेनी चाहिए। 
4. अक्टूबर-नवम्बर में अकृषित क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक पौधे जैसे वडा (सेन्ना सिरेसिया या सेन्ना तोरा) के बीज एकत्रित कर उन्हें
फरवरी-मार्च में छिड़क देना चाहिये। यह वनस्पतियां गाजरघास की वृद्धि एवं विकास को रोकती है। 
5 घर के आस-पास एवं संरक्षित क्षेत्रों में गेंदे के पौधे लगाकर
गाजरघास के फैलाव व वृद्धि को रोका जा सकता है।
6. गाजरघास के साथ अन्य वनस्पतियों को भी नष्ट करने के लिए ग्लायफोसेट (10 से 1.5%) और पास कुल की वनस्पतियों को बचाते हुए केवल गाजरपास को नष्ट करने के लिए 2, 4-डी (10 से 1.5%) या मेट्रिब्यूजिन (0.3 से 0.5%) नाम के शाकनासियों का प्रयोग करे।
7. ग्रीष्म एवं शरद ऋतु में गाजरपास अंकुरित होने के पश्चात् अधिक
बढ़वार नहीं कर पाती, पर पानी मिलने या वर्षा होने पर यही पौधे शीघ्र बढ़कर बीजों का उत्पादन कर देते हैं। अतः ऐसे समय इन्हें शाकनाशियों द्वारा नष्ट करना चाहिए। 
8 फसलो में गाजरघास को रसायनिक विधि द्वारा नियंत्रित करने केलिये खरपतवार वैज्ञानिक की सलाह अवश्य लें। बीटल (जाइप्रोग्रामा बाइकोलोराटा) नामक कीट को वर्षा ऋतु में गाजरघास पर जैविकीय नियंत्रण के लिए 9 बीटल (जाइप्रोग्रामा बाइकोलोराटा) नामक कीट को वर्षा ऋतु में गाजरघास पर जैविकीय नियंत्रण के लिए छोड़ना चाहिए। 
10. अपने परिसर को गाजरघास से मुक्त करने के लिये सभी संभव प्रयास करना चाहिए।

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