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देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा गीत से गूंजा भोजली घाट, देसी फ्रेंडशिप डे पर सजा मेला

आलोक

रक्षाबंधन के दूसरे दिन अर्थात भादो कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि पर हर वर्ष की तरह इस बार भी भोजली पर्व उल्लास और परंपरा के साथ मनाई गई। इस लोक पर्व को लेकर बिलासपुर शहर में भारी उत्साह नजर आया । पिछले कुछ वर्षो की तरह इस बार भी जूना बिलासपुर कतिया पारा, टिकरापारा, गोड़पारा ,कुदुदंड , सरकंडा , चांटीडीह लिंगियाडीह, तोरवा क्षेत्र सहित शहर के अलग-अलग हिस्सों से महिलाएं और युवतियां शोभायात्रा के साथ भोजली विसर्जन करने पचरी घाट पहुंची, जहाँ विसर्जन कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

पिछले कुछ वर्षों की तरह इस बार भी पचरी घाट में भोजली उत्सव का आयोजन किया गया । यहां मेले जैसा नजारा देखा गया। देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा, हमर भोजली दाई के भीजे आठो अंगा… जैसे गीतों को गाती हुई टोलिया सर पर पीले पीले भोजली की टोकरी लिए घाटों में पहुंची। पारंपरिक रूप से सावन महीने की नवमी को छोटी-छोटी टोकारियो में मिट्टी डालकर उसमें धान, गेहूं, ज्वार जैसे अन्न उगाए जाते हैं , इन्हें ही भोजली कहा जाता है। प्रकृति से जुड़े इस पर्व को लेकर छत्तीसगढ़ में खासा उत्साह हमेशा से रहा है । यह देशी फ्रेंडशिप डे भी है। वैसे तो मित्रता ,आदर और विश्वास के प्रतीक भोजली पर्व को लेकर ग्रामीण इलाकों में अधिक उत्साह देखा जाता है । भोजली के साथ कई लोकगीत अभिन्न अंग की तरह जुड़े हुए हैं। भोजली को छत्तीसगढ़ की पहचान भी कहा जा सकता है ।

जहां तक भोजली का शाब्दिक अर्थ ढूंढेंगे तो यह दो शब्द भो और जली से मिलकर बना है। अर्थात भूमि में जल। इसलिए इस पर्व के माध्यम से महिलाएं प्रकृति देवी की पूजा करते हुए अच्छी बारिश और अच्छे अन्न की कामना करती है। सावन शुक्ल नवमी को बोए गए पौधे जब उगते हैं तो उसे ही भोजली देवी कहा जाता है। जिसकी नियमित सेवा की जाती है। भोजली जहां किसान परंपरा का पर्व है वही इसे देसी फ्रेंडशिप डे भी कह सकते हैं। भोजली पर भोजली के पौधे एक दूसरे के कान में खोचकर यहां मितान बनाने की परंपरा है और मित्रता के इस संबंध को आजीवन कायम रखा जाता है ।

भोजली को हम छत्तीसगढ़ी फ्रेंडशिप डे का वर्जन कह सकते हैं। इस दिन हर बार की तरह दोस्त के कान में भोजली खोच कर नए दोस्त ताउम्र के लिए बनाए जाते हैं। भोजली भी हर पर्व की तरह खुशी का पर्व है। इस दिन तरह-तरह के पारंपरिक पकवान बनते हैं और मेले का आयोजन किया जाता है । बिलासपुर में भी आयोजित भोजली मेले में खुशी का यही रंग हर तरफ नजर आया। सर पर भोजली की टोकरिया लिए समूह में लोकगीत गाती आती महिलाएं अद्भुत छटा प्रस्तुत करती रही । वही नदी में विसर्जित भोजली का रंग मन को लुभाता रहा। पचरी घाट के अलावा बिलासपुर में और भी कई स्थानों पर इसी तरह भोजली विसर्जन किया गया। नदी के अलावा कुछ स्थानों में तालाबों में भी भोजली का विसर्जन किया गया ।

संभवतः भोजली ही एकमात्र ऐसा पर्व है जिसकी चर्चा उसके अंतिम दिन अर्थात विसर्जन के दिन होती है। छत्तीसगढ़ के इसी अनूठे पर्व को पूरे उल्लास के साथ मनाया गया। लोगों ने भोजली पर आयोजित मेले का भी खूब लुत्फ लिया।

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