बिलासपुर

जानिए, आखिर भगवान विश्वकर्मा की पूजा अंग्रेजी कैलेंडर अनुसार ही क्यों की जाती है ?

डेस्क

भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवताओं के महल के अलावा स्वर्ग, इंद्रपुरी ,यमपुरी ,द्वारिका रावण की लंका और देवताओं के अमोघ अस्त्र-शस्त्र का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने हीं किया था। जिसमें भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शंकर का त्रिशूल, यमराज का काल दंड आदि शामिल है। हर वर्ष 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। आमतौर पर सभी हिंदू पर्व और त्योहार की तिथियों का निर्धारण हिंदू पंचांग के अनुसार ही होता है, लेकिन विश्वकर्मा पूजा को इसका अपवाद कहा जा सकता है। जिसका निर्धारण अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार होता है। अन्य उत्सव और पर्वो की तिथियां हर वर्ष बदलती है लेकिन विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर को ही मनाई जाती है ।आखिर ऐसी क्या वजह है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 17 सितंबर को की जाती है। इसके पीछे भी कई कहानियां जुड़ी हुई है। भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मा के पुत्र धर्म की सातवीं संतान मानते हैं। पुराणों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा का जन्म आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को हुआ था , तो वहीं कुछ उनका जन्म भाद्र मास की अंतिम तिथि को मानते हैं। यह तिथि आमतौर पर 17 सितंबर के आसपास ही पड़ती है । एक मान्यता अनुसार भगवान विश्वकर्मा माघ महीने की त्रयोदशी को जन्मे थे ।भगवान विश्वकर्मा की जन्मतिथि को लेकर मतभेद हैं लेकिन सवाल वही है कि आखिर इन मतभेदों के बाद भी भगवान विश्वकर्मा की जयंती अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 17 सितंबर को ही क्यों मनाई जाती है । इसे लेकर एक दिलचस्प कहानी है, जिसका संबंध अंग्रेजों के जमाने से है।

कोलकाता के प्रसिद्ध हावड़ा ब्रिज से हम सभी परिचित हैं। कहा जाता है कि जब अंग्रेज भारत पर राज कर रहे थे तो बंगाल का समुद्र तट और नदियां उनके सामानों की आवाजाही के लिए बहुतायत में प्रयोग किए जाते थे लेकिन बंगाल बिहार की हुगली नदी के कारण भारत से सामान विदेश ले जाने में अंग्रेजों को बहुत दिक्कत होती थी। उन्होंने इस नदी पर एक पुल बनाने का निर्णय लिया। अंग्रेजों ने हुगली नदी पर ब्रिज बनाने के लिए बड़े-बड़े लोहे के गडर मंगवाए। चूँकि इससे पहले नदी से सामान लाने ले जाने का काम नाविक करते थे, जिन्हें लगा कि पुल बन जाने से उनकी रोजी-रोटी छीन जाएगी, इसलिए सभी नाविक इस बात से नाराज हो गए और अंग्रेजों की खिलाफत शुरू कर दी। इन्हीं हिंदू नाविकों को खुश करने के लिए अंग्रेजों ने चाल चली और भगवान विश्वकर्मा को मानने वाले नाविकों की खुशामद के लिए वहां मौजूद नाविक और गरीब मजदूरों के लिए मुफ्त खाने-पीने के होटलों की व्यवस्था की गई । यह होटल जिस तारीख को खुले वह तारीख थी 17 सितंबर 1913। मजदूरों को झांसा देने के लिए अंग्रेजों ने उस तारीख को पहले भगवान विश्वकर्मा की पूजा अर्चना की और उसके बाद सबको मुफ्त भोजन कराया और नियमित रूप से भगवान विश्वकर्मा के नाम पर वे गरीबों को मुफ्त खाना खिला कर अपना मकसद हासिल करने में कामयाब रहे। इस तरह अंग्रेज हावड़ा ब्रिज बनाने में कामयाब हो गए लेकिन इसी के साथ 17 सितंबर को अंग्रेजों द्वारा की गई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा स्थापित हो गई और लोग तब से 17 सितंबर को ही कल कारखानों, फैक्ट्री और संस्थानों में 17 सितंबर को ही भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने लगे । चूँकि नए दौर में भगवान विश्वकर्मा की पूजा अंग्रेजों ने शुरू की थी, इसलिए उन्हीं के कैलेंडर के अनुसार तिथि का निर्धारण हो गया । यह बड़ी हैरत की बात है कि हिंदू धर्म का पर्व अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से निर्धारित होता है। शायद इसके पीछे यही कहानी वजह हो, लेकिन फिर भी ठीक-ठीक कहना मुश्किल है कि आखिर 17 सितंबर को ही क्यों भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है । खैर, इससे अलग इस मंगलवार को भी सभी स्थानों में धूमधाम से भगवान विश्वकर्मा की पूजा अर्चना की गई और शिल्पकारो कारीगरों ने उनसे श्रेष्ठ हुनर का आशीर्वाद मांगा।

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