
रमेश राजपूत
बिलासपुर – समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की प्रक्रिया इस वर्ष किसानों के लिए मुश्किलों भरी साबित हो रही है। खासतौर पर भूमि सत्यापन को लेकर बड़ी संख्या में किसान परेशान नजर आ रहे हैं। किसान अपनी मेहनत की फसल बेचने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं, लेकिन कई मामलों में सरकारी रिकॉर्ड में उनकी जमीन ही दर्ज नहीं होने से वे धान बेचने के अधिकार से वंचित हो रहे हैं।
इस वर्ष धान खरीदी के लिए गिरदावरी रिपोर्ट का मिलान और उसके बाद एग्रिस्टेक पोर्टल में पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। पोर्टल में दर्ज आंकड़ों के मिलान की जिम्मेदारी राजस्व विभाग के पटवारी और तहसीलदारों को सौंपी गई है, इसके बावजूद बड़ी संख्या में किसानों का रकबा पोर्टल पर प्रदर्शित नहीं हो पा रहा है। इससे किसान न तो अपनी उपज बेच पा रहे हैं और न ही उन्हें समय पर समाधान मिल रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि किसान सप्ताहों से राजस्व कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या का निराकरण नहीं हो पा रहा है। कई किसानों का कहना है कि वर्षों से जिस जमीन पर वे खेती कर रहे हैं, वही भूमि अब रिकॉर्ड में गायब दिखाई दे रही है। मामले में जिला कलेक्टर संजय अग्रवाल ने बताया कि अधिकांश प्रकरणों का निराकरण कर लिया गया है और शेष किसानों के लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जा रही है। हालांकि प्रशासनिक दावों के विपरीत जमीनी हकीकत यह है कि अब भी कई किसान परेशान हैं और उनकी सुनवाई नहीं हो पा रही है। ऐसे में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की व्यवस्था किसानों के लिए राहत के बजाय चिंता का कारण बनती जा रही है।