
रमेश राजपूत
बिलासपुर – प्रदेश के चर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले में बिलासपुर तहसील के तीन लिपिकों को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने के बाद अब कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। प्रदेश लिपिक संघ के प्रांताध्यक्ष रोहित तिवारी ने बिलासपुर पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि मामले में डीजीपी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने इसे एक लोक सेवक के खिलाफ जल्दबाजी में की गई कार्रवाई बताया है। रोहित तिवारी के मुताबिक, किसी लोक सेवक के खिलाफ संज्ञेय अपराध सामने आने अथवा भ्रष्टाचार का संदेह होने पर सीधे गिरफ्तारी और अपराध दर्ज करने के बजाय पहले प्रारंभिक जांच का प्रावधान है। संबंधित लोक सेवक के नियंत्रण अधिकारी अथवा जिला दंडाधिकारी से विस्तृत जानकारी लेकर तथ्यों की प्रारंभिक जांच की जानी चाहिए। इसके बाद ही अपराध पंजीबद्ध करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। उनका आरोप है कि सर्पदंश मुआवजा मामले में इस प्रक्रिया की अनदेखी की गई।
उन्होंने कहा कि सर्पदंश से मृत्यु के बाद मुआवजा प्रकरण की प्रक्रिया की शुरुआत ही पुलिस स्तर से होती है। इसके बाद डॉक्टर की रिपोर्ट, पटवारी की जांच और फिर पीठासीन अधिकारी के स्तर पर प्रकरण आगे बढ़ता है। ऐसे में लिपिकों की भूमिका सीधे तौर पर निर्णय लेने वाली नहीं होती। इसके बावजूद केवल लिपिकों के बैंक ट्रांजेक्शन को आधार बनाकर कार्रवाई करना उचित नहीं है। इस मामले में नरेंद्र कौशिक, गरीब राम बिंझवार और हरिशंकर राठौर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है।रोहित तिवारी ने कहा कि पुलिस को नियमों की पूरी जानकारी होने के बावजूद जल्दबाजी में कार्रवाई की गई है। लिपिक संघ इस कार्रवाई का विरोध करता है। उन्होंने बताया कि संघ की ओर से डीजीपी को पत्र लिखकर मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की जाएगी। जरूरत पड़ी तो संघ सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ेगा।