छत्तीसगढ़

पड़ाव चौक की घटना के बाद दो खेमों में बटा मुंगेली, एक वर्ग सोशल मीडिया पर सक्रिय तो दूसरा पुलिस के पक्ष में मुखर

डेस्क

पहली घटना-: बिलासपुर तोरवा थाने में घुसकर नगर निगम सभापति और उनके गुर्गे सिपाही को थप्पड़ मार कर अपराधी को छुड़ा ले जाते हैं।

दूसरी घटना-: गलत ढंग से ऑटो चला रहे ऑटो चालक को जरहाभाटा क्षेत्र में सिपाही रोकता है तो ऑटो चालक सिपाही को सरेराह पिट देता है।

तीसरी घटना -: उसलापुर में कुछ लोग रेल पटरियों के पास बैठकर शराब पी रहे थे ।आरक्षक द्वारा उन्हें ऐसा करने से मना किए जाने पर उन्होंने उसकी ही पिटाई कर दी।

इन सभी घटनाओं से केवल पुलिस का मनोबल ही नीचे नहीं गया बल्कि पुलिस की छवि भी बेहद खराब हुई। पुलिस कमजोर प्रतीत होने लगी ।आज भी आम लोगों को लगता है की वर्दी के पीछे मौजूद इंसान में ऐसी खास ताकत मौजूद है, जिससे आम आदमी तो क्या अपराधी भी खौफ खाता है। और यही खौफ कानून व्यवस्था कायम रखने और अपराध रोकने के काम आता है, लेकिन जब- जब वर्दीधारी पर हमले हुए हैं, तब – तब पुलिस की छवि कमजोर, दब्बू और बेचारे वाली बनी है । हैरानी इस बात की है कि पब्लिक, मीडिया और पुलिस अधिकारी भी ऐसी हरकतों के बाद इस मामले में पीड़ित सिपाही के ही खिलाफ नजर आते हैं । वैसे तो अपेक्षा की जाती है कि वे अपराधियो का हर हाल में डटकर मुकाबला करे और हमेशा विजयी रहे। लेकिन जब नियम, कानून, अनुशासन और बेजा राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस अधिकारियों के हाथ-पांव बांध दिए जाते हैं तो फिर उनके सामने केवल मार खाने और अपमानित होने के दूसरा विकल्प बचता भी नहीं। शायद हमारे समाज का यही दोहरा चेहरा है । हम उस मुहाने पर खड़े हैं जहां समाज का दोगलापन बार-बार सामने आता है। उन्हें वर्दी के पीछे सिंघम चाहिए जो उनकी रक्षा हर हाल में करें, लेकिन जैसे ही वह अपराधियों पर कार्यवाही करता है तो पुलिस का सिपाही बर्बर और जालिम नजर आने लगता है। हैरानी इस बात की है कि उच्च अधिकारियों की सोच भी इससे अलग नहीं है। मुंगेली में 2 दिन पहले घटी एक घटना के चलते पुराने घटनाक्रम याद आने लगे। मुंगेली पड़ाव पारा चौक पर हेम चंद्र जोशी और जगदीश ओगरे नाम के दो बदमाश किस्म के युवक शराब पीकर हंगामा मचा रहे थे। लगातार गाली गलौज और तोड़फोड़ किए जाने से आसपास की व्यापारी परेशान हो उठे थे यह दोनों छोटे-मोटे फल सब्जी आदि का ठेला लगाने वाले व्यापारियों को भी तंग करते हुए उनका सामान लूट रहे थे और कुछ कहने पर उनके साथ हुज्जत बाजी भी कर रहे थे। इतना ही नहीं उस रास्ते से निकलने वाली महिलाओं और युवतियों पर भी यह दोनों बेहद अश्लील कमेंट कर रहे थे । इससे आसपास मौजूद व्यापारियों और लोगों का गुस्सा इन पर बढ़ता जा रहा था, लेकिन चूँकि दोनों एक खास समाज से संबंधित है जिनकी एकजुटता सरकार और पुलिस के भी हाथ बांध देते हैं, इसलिए इन लोगों ने कानून को हाथ में लेने से बेहतर पुलिस को सूचित करना समझा। सूचना पाकर कोतवाली टीआई आशीष अरोरा अपने एक सिपाही के साथ मौके पर पहुंचे ।जहां पहले से एक ट्रैफिक आरक्षक भी मौजूद था। थाना प्रभारी आशीष अरोरा के पास उस वक्त सरकारी वाहन उपलब्ध नहीं था इसलिए एक ऑटो बुलाकर दोनों को थाने ले जाने की कोशिश की गई। किसी तरह एक शराबी पर काबू पाकर उसे ऑटो में बिठा दिया गया लेकिन दूसरा किसी तरह काबू में आने को तैयार ही नहीं था। राजनीतिक संरक्षण की हवा उसमें इस कदर भरी थी कि वह पुलिस के सिपाही को ही गाली गलौज देने लगा और उनसे मारपीट करने की भी कोशिश की। दोनों सिपाहियों से जब अपराधी काबू में नहीं हो रहा था तो आखिर कार थाना प्रभारी आशीष अरोरा को भी मामले में दखल देना पड़ा और उन्होंने बल का प्रयोग किया, जिससे अपराधी पस्त भी हुआ। ऐसे मौकों पर किस तरह अपराधी पर काबू पाया जाए यही प्रशिक्षण इन अधिकारियों को दिया गया है लेकिन जब वे मौके पर नागरिकों की सुरक्षा के लिए उसे अंजाम देते हैं तो उच्च अधिकारी खुद इसकी आलोचना करने लगते हैं। जाहिर है इससे पुलिस का मनोबल कमजोर होता है । जिस वक्त तीनों पुलिसकर्मी अपराधियों को ऑटो में ले जाने की कोशिश कर रहे थे, उसी वक्त किसी ने पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाकर वायरल कर दिया और मुंगेली का एक खास वर्ग इसे सोशल मीडिया पर अलग ही रंग देने लगा। अपराधियों को शोषित और पुलिस को बर्बर बताने की साजिश शुरू कर दी गई। हेमचंद और जगदीश कितने मासूम थे इसका अंदाजा थाने में भी हो गया। आमतौर पर बड़े से बड़े अपराधियो की भी पुलिस थाना पहुंचने पर घिग्गी बंध जाती है, लेकिन ही दोनों थाने में ही हंगामा मचाने लगे। महिला पुलिसकर्मी के सामने ही गंदी गंदी गालियां बकते हुए दोनों थाना प्रभारी को धमकाते देखें गए।

खुद को पूर्व मुख्यमंत्री का करीबी बताते का धौंस देकर ट्रांसफर की धमकी दी जाने लगी ।इसका भी एक वीडियो वायरल हुआ है । लेकिन पक्षपातपूर्ण कार्यवाही में कहीं भी उस वीडियो को वायरल कर आरोपियों की हरकतों पर सवाल नहीं खड़े किए जा रहे। उंगली सिर्फ पुलिस पर उठाई जा रही है। वहीं पुलिस, जिससे सभी कानून व्यवस्था बनाए रखने की उम्मीद करते हैं। अगर पुलिस मौके पर अपराधियों पर काबू नहीं पाती और खड़े-खड़े उनसे गालियां सुनती और मार खाती तो भी यही लोग पुलिस पर हंसते और आलोचना करते। यही नहीं ऐसे वीडियो के वायरल होने पर एसपी और आईजी इन्हीं पुलिसकर्मियों पर शायद सख्त कार्यवाही भी करते, लेकिन जब इन्होंने अपना काम किया, तब भी नतीजे वैसे ही निकले। कई पुलिसकर्मी इस घटना के बाद यही कह रहे हैं कि या तो हम सड़क पर अपराधियों से मार खाए या फिर विभागीय कार्यवाही झेले। ना तो जनता पुलिस की तकलीफों को समझ रही है और ना ही उच्च अधिकारी। राजनीतिक दबाव और मीडिया के प्रभाव से फैसले लिए जा रहे हैं। बेहतर होता कि फैसले लिए जाने से पहले उस दूसरे वायरल वीडियो को भी देख लिया जाता, जिसमें यही दोनों शातिर अपराधी पुलिस थाने में हंगामा मचाते नजर आ रहे हैं। मीडिया में ने एकपक्षीय नजरिया पेश करते हुए पहले वायरल वीडियो को आई जी के सामने पेश किया। जिसे उन्होंने अमर्यादित आचरण मानते हुए मुंगेली एसपी सीडी टंडन को जांच के आदेश दिए। बताया जा रहा है कि मुंगेली में नव पदस्थ एडिशनल एसपी चंदेल मामले की जांच करेंगे । यह भी कहा जा रहा है कि यह जांच मीडिया और एक विशेष समाज के दबाव में लिया गया फैसला है ।
अब सवाल यही उठता है कि ऐसे मौकों पर पुलिसकर्मियों को क्या करना चाहिए ? क्या वे अपराधियों की गालियां सुने उन से पिटे जाए, उनके आगे घुटने टेक दे या फिर वर्दी ने उन्हें जो ताकत और अधिकार दिए हैं उसका इस्तेमाल करते हुए वे अपराधियों पर कार्यवाही करें ? पिछले दिनों मुंगेली में जो कुछ हुआ और उसके बाद जिस तरह आई जी प्रदीप गुप्ता ने पुलिसकर्मियों के ही खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं, उससे अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर स्पष्ट देखा जा सकता है कि एक समाज के ही कुछ लोग इस मामले को षड्यंत्र पूर्वक तूल दे रहे हैं और बेवजह पुलिस बर्बरता और मासूमों को कुचलने की बात की जा रही है । दोनों आरोपी कितने मासूम है यह जानने के लिए दूसरा वीडियो देखना बेहद जरूरी है, लेकिन बड़े ही शातिराना तरीके से उस वीडियो को नज़रंदाज़ कर दिया गया है। उसकी कहीं चर्चा नहीं की जा रही है। मीडिया भी जानती है कि पुलिस के खिलाफ लिखी खबरें रुचि लेकर पढ़ी जाती है । पुलिस के खिलाफ लिखना ट्रेंड बन चुका है और मीडिया को भी सुर्खियों में रहना पसंद है, इसीलिए वह वही सब कुछ दिखा और छाप रही है जो पुलिस की चिर परिचित छवि बन चुकी है। सच बताने की ताकत शायद मीडिया ने खो दिया है और सोशल मीडिया पर भी धड़ल्ले से झूठ परोसा जा रहा है ।अगर पुलिस कर्मियों ने दोनों शराबियों पर बल का प्रयोग किया तो यह बताना भी जरूरी है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया और लोगों के लिए यह जानना भी जरूरी है कि इन्हीं दोनों ने थाने पहुंचकर कैसी शराफत दिखाई। लेकिन सुविधा वाली राजनीति के इस दौर में मामले को केवल वही रंग दिया जाता है जो उन्हें सूट करता है। इस मामले में भी ऐसा ही किया जा रहा है ।

वैसे तो पुलिस के अधिकारियों का तबादला एक सामान्य प्रक्रिया है और मुमकिन है कि या मामले में भी अपने ही विभाग की ताकत को कुंद करते हुए उच्च अधिकारी संबंधित पुलिसकर्मियों का तबादला कर दे, लेकिन इससे शायद ही कुछ बदलेगा। अलबत्ता उन पुलिसकर्मियों का मनोबल हमेशा के लिए टूट जाएगा और भविष्य में जब भी वे ऐसी ही किसी परिस्थिति से दो चार होंगे तो अपराधियों के आगे वे या तो नतमस्तक हो जाएंगे या फिर ऐसे मामलों से कन्नी काट जाएंगे। अंततः इसका खामियाजा उन्हीं नागरिकों को उठाना पड़ेगा जिन की रक्षा के लिए पुलिस है । केवल एक वर्ग और खास किस्म के अपराधियों को खुश करने के लिए बिलासपुर से लेकर मुंगेली तक इस घटना के बाद जो कुछ किया जा रहा है, वह किसी भी लिहाज से अनुकरणीय नहीं है और न हीं ऐसे कदमों से पुलिस का मनोबल बढ़ सकता है। सोशल मीडिया पर कुछ समर्थक पुलिस को दमनकारी और अपराधियों को मासूम बताकर जिस तरह अपराधियो का महिमामंडन कर रही है, उसके बेहद खतरनाक नतीजे समाज को भोगने पड़ सकते हैं । लेकिन सुविधा की राजनीति के इस दौर में भला समाज की किसको फिक्र है ? देश ,,कानून व्यवस्था, इमानदारी, आदर्श की बातें किताबों में सीमित है या फिर पुलिस ट्रेनिंग तक ही इन बातों को समेट कर रख दिया गया है । इस पर भी चिंतन, मनन और विमर्श की आवश्यकता है। अगर अपराधियों के लिए उनके समाज के लोग संगठित हो सकते हैं तो फिर समाज के उस वर्ग को भी इसके खिलाफ संगठित होना होगा, जिनकी रक्षा के लिए पुलिस ने यह कदम उठाया। यह परंपरा बन चुकी है कि मीडिया केवल पुलिस की बुराई ही दिखाएगी ।अगर कभी मीडिया ने सच दिखाते हुए पुलिस का दर्द बयां किया, तो उसे चाटुकारिता बताने वालों की कमी नहीं है। हैरानी इस बात की भी है कि जब इन्हीं लोगों पर कोई मुसीबत आएगी तो यह खुद उसी पुलिस की मदद लेंगे और अपेक्षा भी यही करेंगे कि पुलिस उन लोगों पर सख्त कार्यवाही करें, बल का प्रयोग करें, जो उन्हें सता रहे हैं। यही दोगलापन समाज को गर्त की ओर ले जा रहा है । कहीं तो ठहर कर सोचने की आवश्यकता है कि आखिर समाज पुलिस से चाहता क्या है ?

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