
अपने जीवन में कितनी गलतियाँ की हैं और हमें अस्तित्व ने कितना अवसर दिया है इस जीवन को जीने का, अनुभव प्राप्त करने का. चाहे बड़ी से बड़ी घटना हो जाये दंड के साथ एक अवसर सुधरने का अवश्य मिलना चाहिए.
बिलासपुर सतविंदर सिंह अरोड़ा
आयुष! लम्बी उम्र हेतु दिया जाने वाले आशीर्वाद के अंश का अंत इस अल्पायु में होगा इसका अंदाजा किसी को न था. क्या उसकी गलती इतनी बड़ी रही होगी कि उसे अपनी शरीर यात्रा का अंत करना ही सुखद लगा? प्रश्न तो कतारबद्ध खड़े हैं किन्तु उसने अन्य कई ऐसे प्रश्न अभिभावकों, विद्यालयों के समक्ष खड़े कर दिए हैं जो परवरिश के तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं. परिवार एक शॉक अब्सोर्बर की तरह, एक कुशन की तरह होता है जो बच्चे को सही राह दिखाते हुए उसके साथ खड़ा रहता है. ध्यान रहे, साथ खड़े रहने की बात है, बच्चे के विरोध में नहीं. लेकिन अफ़सोस आज हो तो यही रहा है. किसी शिक्षक ने बच्चे की शिकायत अभिभावक के की तो अभिभावक वहीँ बच्चे को कोसने लग जाते हैं और घर जाते तक यहाँ तक की घर जाने के बाद भी बच्चे की खैर नहीं होती. परिवार में जिसको भी बच्चे की शिकायत के बारे में पता चलता है तो वह भी अपना राग अलापना शुरू कर देते हैं. बच्चे के पास नसीहतों का भण्डार जमा हो जाता है और बच्चे के इस मूड में वह भण्डार कचरे के ज्यादा कुछ नहीं होता. अरे भाई, बच्चा आपका है तो जिम्मेदारी भी आपकी है. आप स्कूल, समाज आदि पर अपने बच्चे को थोप नहीं सकते हैं. आपने स्कूल, समाज आदि से पूछ कर बच्चे को दुनिया में लाया था क्या? आप बच्चे के साथ खड़े नहीं हो सकते. यदि बच्चा गलत है तब भी आपके पास उसे समझाने का समय नहीं है. अब ऐसे में बच्चा कहाँ जायेगा. एक तो हमारी तथाकथित शिक्षा पद्यति मानव रूपी रोबो तैयार करने में लगी है. और हम उस हवन कुंड में जमकर आहुति दिए जा रहे हैं. और इसी हवन ने एक आहुति के रूप में आयुष की बलि ले ली. इसका कानूनन जिम्मेदार कौन हो यह बाद की बात है पहले तो यह अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है की यदि स्कूल में कोई शरारत की है बच्चे ने तो बच्चे को समय दे कर समझाएं व साथ रहे. क्या सुधरने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए किसी को भी? ज़रा सोचिये कि हमने भी अपने जीवन में कितनी गलतियाँ की हैं और हमें अस्तित्व ने कितना अवसर दिया है इस जीवन को जीने का, अनुभव प्राप्त करने का. चाहे बड़ी से बड़ी घटना हो जाये दंड के साथ एक अवसर सुधरने का अवश्य मिलना चाहिए. आयुष का अंतिम लेख बता रहा है की उसके अन्दर कितनी संवेदनशीलता थी. कितनी समझ थी की उसने अपनी दीदी जीजाजी को न रोने कहा व अपनी दीदी का वैवाहिक आयोजन निर्धारित तिथि को ही करने को कहा. इससे समझ आता है की विद्यालय प्रबंधन व अभिभावकों से इस प्रकरण को सँभालने में बड़ी चूक हो गई. किन्तु यदि इस प्रकरण को ध्यान में रख बाकी के अभिभावक जागरूक हो जायें व अपने बच्चों के मार्गदर्शन और मित्रतापूर्ण संवाद में लगातार बने रहें, तो शायद अन्य कोई आयुष आयुष्मान होने से नहीं चूकेगा. श्रद्धांजलि आयुष! तुम वर्तमान संवेदनहीन शिक्षा व्यवस्था के शिकार हो गए.