छत्तीसगढ़बिलासपुर

महुआ की खुशबू से महक रहे जंगल, जानकारी ना होने से ठगे जा रहे वनवासी

महुआ के फल को कलिन्दी भी कहते हैं, वहीं इसके भीतर से निकलने वाले जीरे जैसे बीज का प्रयोग भी कई दवाओं में होता है

बिलासपुर प्रवीर भट्टाचार्य

इन दिनों वनांचल महुआ की खुशबू से महक रहा है। जंगल में दूर-दूर तक महुआ की महक फैली हुई है ।ग्रामीणों के लिए यह मौसम महुआ चुनने का है, जिससे उन्हें आय का एक स्रोत मिल गया है। वनांचल के लोग, खासकर आदिवासी समाज, इन्हीं वनोपज पर निर्भर है। इसलिए इन दिनों सुबह से ही टोलियां महुआ के पेड़ के पास पहुंच जाती है और पेड़ से टप टप टपक रहे महुआ को करीने से बिन कर टोकने में संजोया जाता है। छत्तीसगढ़ के इलाके में जंगल में अपने आप महुआ के पेड़ फलने फूलने लगते हैं। इसके पके हुए फलों का गूदा खाने में मीठा और तेज महक लिए होता है। एक पेड़ से 20 से लेकर 200 किलो तक महुआ मिल सकता है। वैसे तो इसके तेल से साबुन डिटर्जेंट का निर्माण किया जाता है और कहीं कहीं वनस्पति घी भी बनाया जाता है। ईंधन के रूप में भी महुआ से निकले तेल का प्रयोग किया जा सकता है ।वही तेल निकालने के बाद बची खली को जानवरों को खाने के लिए देते हैं या फिर उससे खाद भी बन सकता है। महुआ के सूखे फलों को मेवे की तरह भी स्थानीय लोग इस्तेमाल करते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में महुआ का सबसे अधिक उपयोग शराब बनाने के लिए होता है । ग्रामीण क्षेत्रों में महुआ की शराब विख्यात है और इसे ग्रामीण पसंद करते हैं। पेड़ों में लदे महुआ के फल इन दिनों अपने आप झड़ रहे हैं। डालियों के सिरों पर कलियों के गुच्छे नजर आते हैं, जिनमें फले महुआ पकने के बाद झर झर, झर रहे हैं ।

वैसे जंगलों में महुआ के फलों के टपकने का यह सिलसिला महीने भर से अधिक नहीं चलता। इसे सिर्फ इंसान ही पसंद नहीं करते , बल्कि पशु और पक्षी भी बड़े चाव से इन्हे खाते हैं। भालू तो महूए के दीवाने हैं। महुआ की गंध उन्हें दूर से खींच लाती है। भालू महुआ पर अपना एकाधिकार समझते हैं , इसीलिए महुआ बिनते ग्रामीणों पर अक्सर भालू हमला भी कर देते हैं। उन से बचते, बचाते ग्रामीण इन दिनों महुआ चुन रहे हैं । वैसे तो सरकार की ओर से महुआ खरीदने की व्यवस्था है लेकिन उस से अनभिज्ञ होने की वजह से सीधे-साधे ,भोले-भाले ग्रामीण महुआ को स्थानीय पंसेरी या फिर कोंचिओ को ओने पौने दाम में बेच देते हैं । दिन भर में यह लोग एक टुकना महुआ बिन लेते हैं, जिससे उन्हें 50 रुपए मिल जाते हैं और ये इसी में खुश है ।
महुआ के फल को कलिन्दी भी कहते हैं, वहीं इसके भीतर से निकलने वाले जीरे जैसे बीज का प्रयोग भी कई दवाओं में होता है। वैद्य महुआ के फूल को मधुर शीतल धातु वर्धक और दाह पित्त वात नाशक ह्रदय हितकारी बताते हैं। इसके तेल का प्रयोग कफ, पित्त दोष दूर करने में भी किया जाता है। ग्रामीण महुआ चुनने के बाद इन्हें धूप में सुखा देते हैं, जिसके बाद वाष्पीकरण का प्रयोग करते हुए महुए से शराब तैयार किया जाता है । इन दिनों अगर आप जंगल की ओर निकल पड़ेंगे तो हर तरफ महुए की गंध आप महसूस कर सकेंगे। यह गंद भी कम मादक नहीं है।

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