
उदय सिंह
बिलासपुर – न्यायधानी बिलासपुर में इलाज के दौरान एक आदिवासी महिला की मौत के बाद उसके शव को अस्पताल में रोके रखने के आरोपों ने मानवीय संवेदनाओं और निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला तोरवा थाना क्षेत्र स्थित हरिओम हॉस्पिटल का है, जहां कोरिया जिले की निवासी 47 वर्षीय तिल बसिया बाई पति जगन्नाथ का उपचार चल रहा था। मिली जानकारी के अनुसार, 25 जुलाई को पेड़ से गिरने की वजह से दुर्घटना में घायल होने के बाद महिला को इलाज के लिए हरिओम हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था।
जहाँ उपचार के दौरान 29 जुलाई की सुबह उनकी मौत हो गई। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने इलाज का बिल जमा नहीं होने के कारण शव को 24 घंटे से अधिक समय तक अस्पताल में ही रोके रखा।जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष विजय केशरवानी ने बताया कि इस घटना की जानकारी सांसद ज्योत्सना महंत को मिलने के बाद उनकी सूचना पर वह अस्पताल पहुंचे और पूरे मामले पर नाराजगी जताते हुए कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि यदि महिला की मृत्यु हो चुकी थी तो शव को तत्काल सरकारी अस्पताल की मर्च्युरी क्यों नहीं भेजा गया। उनका आरोप है कि बिल भुगतान नहीं होने के कारण शव को अस्पताल में ही रखा गया, जो अत्यंत अमानवीय है।
वहीं, अस्पताल प्रबंधन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। अस्पताल के डॉ. अभिषेक के अनुसार मामला मेडिको-लीगल केस का था, इसलिए शव परिजनों को सीधे नहीं सौंपा जा सकता था। उन्होंने बताया कि पुलिस को समय पर सूचना दे दी गई थी और पुलिस की मौजूदगी में पंचनामा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाना था। लेकिन परिजन यहां नही थे, फोन भी बंद था। अस्पताल प्रबंधन ने यह भी स्वीकार किया कि इलाज के दौरान करीब 84 हजार रुपये का बिल बना था, जबकि परिजनों ने केवल 5 हजार रुपये जमा कराए थे।
हालांकि उनका दावा है कि बिल के भुगतान को लेकर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया गया और न ही शव रोककर पैसे मांगे गए। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर परिजन महिला को इलाज के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर बिलासपुर तक लाए, तो फिर मृत्यु के बाद उसे लेने में देरी क्यों हुई? माना जा रहा है कि वे बिल की व्यवस्था के लिए गांव लौटे होंगे। अब इस संवेदनशील मामले की सच्चाई परिजनों के पहुंचने और प्रशासनिक जांच के बाद ही सामने आएगी।