रतनपुर

भारत का पहला स्वदेशी ज्ञान अध्ययन केंद्र का शुभारंभ,लोक स्वास्थ्य परंपरा को वैज्ञानिक प्रमाणिकता सिद्ध करने हेतु होगी पहल

जुगनू तंबोली

सागर – डा हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर मध्य प्रदेश में पारंपरिक वैद्यकीय ज्ञान आधारित चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिक प्रमाणिकता सिद्ध करने एवं दुर्लभ वनौषधियों के संरक्षण संवर्धन एवं विकास हेतु यह केन्द्र सरकार के सहयोग से प्रारंभ किया जाएगा। लोक स्वास्थ्य परंपरा संवर्धन अभियान भारत के राष्ट्रीय समन्वयक वैद्य निर्मल अवस्थी से प्राप्त जानकारी अनुसार उन्होंने बताया कि विगत 4 वर्षों से प्रोफेसर के के एन शर्मा के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ राज्य के पारंपरिक वैद्यों को विश्व विद्यालय में आमंत्रित कर वनौषधि आधारित चिकित्सा पद्धति का विश्लेषण किया जा रहा था

और पारंपरिक वैद्यों की उपचार पद्धति पर शोध कार्य प्रारंभ किए जा रहे थे जिसका परिणाम सार्थक सिद्ध हुआ है। अवस्थी ने बताया कि भारत का यह ऐसा पहला स्वदेशी ज्ञान अध्ययन केंद्र होगा जहां सम्पूर्ण भारत की लोक स्वास्थ्य परंपरा को वैज्ञानिक प्रमाणिकता सिद्ध करने हेतु पहल की जाएगी और यह अलग से विभाग बनाया गया है जिसे यूजीसी से मान्यता मिल चुकी है एवं 90 लाख का आबंटन भी किया गया है। इस अध्ययन केंद्र में छात्राओं को अनुसंधान हेतु मदद मिल सकेगी एवं पारंपरिक वैद्यों को उपचार पद्धति को वैज्ञानिक प्रमाणिकता ताकि उनके परिवार की सतत आजीविका विकास में सहायक सिद्ध होगी,

दूसरी ओर आम जनमानस को आसाध्य बिमारियों से वनौषधि चिकित्सा पद्धति का लाभ हो सकेगा। अवस्थी ने बताया कि बस्तर एवं बिलासपुर एवं रायपुर के ख्याति प्राप्त पारंपरिक वैद्यों ने इस कार्यक्रम में शामिल हुए जहां आंखों से जाला निकाल कर वैज्ञानिकों को हतप्रभ कर दिया, कांकेर कोंडागांव के आदिवासी बहुल इलाके के वैद्यों ने गांठ एवं मुख के कैंसर बिलासपुर के पारंपरिक वैद्यों ने भी कई असाध्य बिमारियों के सफल उपचार का कीर्तिमान स्थापित किया है। छत्तीसगढ़ पऱंपरागत वनौषधि प्रशिक्षित वैद्य संघ के बीच एमओयू कर इस केंद्र का संचालन किया जाएगा

इसकी घोषणा डा हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर की कुलपति प्रोफेसर नीलिमा गुप्ता ने की उन्होंने कहा कि हमारा विश्वविद्यालय हर संभव मदद करेगा और यहां विलुप्त हो रही वनौषधियों का एक संरक्षण केन्द्र एवं विश्व विद्यालय परिसर में ही 10-20 एकड़ भूमि आवश्यकता अनुसार भी इस कार्य हेतु प्रदान की जाएगी, हमारे विकास में हमारी प्राचीन विधा का मुख्य योगदान है इनका संरक्षण संवर्धन करना हमारा कर्तव्य है। छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के 25 ख्याति प्राप्त पारंपरिक नाड़ी विशेषज्ञ वैद्यों ने इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

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