रतनपुर

VIDEO:”रतनपुरिहा भादो गम्मत” विलुप्ति की कगार पर….. छत्तीसगढ़ी लोककला को संरक्षण और संवर्धन की दरकार,

जगनू तंबोली

बिलासपुर – छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपराओं की पहचान रही रतनपुरिहा भादो गम्मत आज विलुप्त होने के कगार पर है। करीब डेढ़ सौ साल पुरानी यह परंपरा कभी रतनपुर नगर के हर मोहल्ले में उत्सव का रंग भर देती थी। भादो माह में सप्ताह भर तक नगर में उत्सव जैसा माहौल रहता, जिसमें स्थानीय कलाकार भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और रासलीलाओं का मंचन करते थे। लेकिन आधुनिक मनोरंजन संसाधनों की चकाचौंध और नई पीढ़ी की उदासीनता के चलते यह गौरवशाली परंपरा अब सिमट कर कुछ मोहल्लों तक सीमित रह गई है।

जानिए क्या है भादो गम्मत

भादो माह में आयोजित होने वाला यह उत्सव मूल रूप से भगवान कृष्ण की लीलाओं पर आधारित होता है। मंच पर कलाकार कृष्ण की बाल लीलाएं, गोपियों संग रास, पूतना वध, कंस वध जैसी घटनाओं का जीवंत मंचन करते हैं। पारंपरिक वेशभूषा और अभिनय के जरिए प्रस्तुतियां इस कदर जीवंत होती थीं कि दर्शक भी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। कभी रतनपुर के करैहापारा, खालहेपारा, बाबूहाट,महामायापारा, बड़ीबाजार, भेड़ीमूड़ा सहित सभी मोहल्लों में यह आयोजन होता था। आसपास के गांवों से भी हजारों लोग इसे देखने आते और नगर उत्सव की रौनक से सराबोर रहता।

विलुप्ति के कुछ कारण…

समय के साथ इस कला के प्रति लोगों की रुचि कम होती चली गई। पुराने कलाकार और आयोजक अब बचे नहीं, वहीं नई पीढ़ी ने इस परंपरा से दूरी बना ली। मोबाइल, टीवी, सिनेमा और सोशल मीडिया जैसे आधुनिक मनोरंजन साधनों ने युवाओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। नतीजा यह हुआ कि आज यह परंपरा केवल करैहापारा, बाबूहाट और खालहेपारा जैसे कुछ इलाकों तक सीमित रह गई है। कभी जहां हर मोहल्ले में गम्मत का आयोजन होता था, वहीं अब गिनती के स्थानों पर ही इसकी झलक देखने मिलती है।

संरक्षण और संवर्धन की जरूरत

रतनपुरिहा भादो गम्मत केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की आत्मा है। इसमें हमारी सामाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक धरोहर और कलात्मक अभिव्यक्ति झलकती है। यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो यह लोककला आने वाले समय में सिर्फ बुजुर्गों की यादों तक सीमित होकर रह जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके संरक्षण के लिए शासन और समाज दोनों को मिलकर पहल करनी होगी। सबसे पहले युवाओं को इस कला से जोड़ने के प्रयास करने होंगे। विद्यालयों और महाविद्यालयों में गम्मत पर कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हैं। कलाकारों को मंच और प्रोत्साहन देने के साथ-साथ आर्थिक सहयोग भी आवश्यक है।

शासन की पहल जरूरी

आज जरूरत है कि शासन-प्रशासन इस कला के संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाए। सांस्कृतिक विभाग की योजनाओं में भादो गम्मत को शामिल कर कलाकारों को प्रशिक्षण, सम्मान और सहयोग दिया जाए। ग्राम और नगर स्तर पर प्रतियोगिताएं एवं आयोजन कर युवाओं को मंच प्रदान किया जाए। केवल तब ही यह परंपरा फिर से जन-जन तक पहुंच सकेगी।
रतनपुरिहा भादो गम्मत छत्तीसगढ़ की पहचान और गौरव रही है। यह केवल कृष्ण लीलाओं का मंचन नहीं, बल्कि लोक जीवन के उत्सव, श्रद्धा और संस्कृति की झलक है। आज इसकी परंपरा कमजोर जरूर हुई है, पर यदि समाज और शासन मिलकर प्रयास करें तो इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है। वरना यह लोककला भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी।

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