
उदय सिंह
बिलासपुर – ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क एवं बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए संचालित सरकारी स्वास्थ्य केंद्र ही यदि निजी कमाई का जरिया बनने के आरोपों से घिर जाएं, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मस्तूरी विकासखंड के उप स्वास्थ्य केंद्र धुर्वाकारी को लेकर ग्रामवासियों ने कलेक्टर बिलासपुर को शिकायत सौंपकर केंद्र में कथित अनियमितताओं और अवैध गतिविधियों पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है। शिकायत में पदस्थ ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजक अर्चना रॉके पर सरकारी पद और संसाधनों के कथित दुरुपयोग सहित गंभीर आरोप लगाए गए हैं। 21 सितंबर 2026 को कलेक्टर को सौंपे गए शिकायत पत्र में ग्राम धुर्वाकारी के ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि उप स्वास्थ्य केंद्र परिसर में स्थित शासकीय आवास का व्यावसायिक उपयोग करते हुए कथित तौर पर निजी क्लीनिक/अस्पताल संचालित किया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र का उद्देश्य ग्रामीणों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि उसी परिसर में निजी चिकित्सा गतिविधियां संचालित हो रही हैं तो इससे सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
सरकारी दवाइयों के बजाय निजी दवाइयां देने का आरोप
ग्रामीणों ने शिकायत में आरोप लगाया है कि केंद्र में आने वाले गरीब एवं जरूरतमंद मरीजों को शासन की ओर से उपलब्ध कराई जाने वाली निःशुल्क दवाइयां देने के बजाय कथित रूप से निजी माध्यम से दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं और मरीजों से मनमानी राशि वसूलने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह न केवल सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा, बल्कि उन ग्रामीण परिवारों पर भी आर्थिक बोझ डालेगा, जिनके लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्र ही उपचार का सबसे सुलभ माध्यम हैं।
प्रसव के नाम पर राशि वसूली का भी आरोप
शिकायत में सबसे गंभीर आरोप उप स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव कराने वाली महिलाओं से जुड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रसव के बाद प्रसूता महिलाओं और उनके परिजनों से कथित रूप से 2 हजार से 5 हजार रुपये तक की राशि वसूली जाती है, जबकि संबंधित सरकारी सेवाएं निःशुल्क होने का दावा किया गया है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि गर्भपात कराने और उससे संबंधित दवाइयां उपलब्ध कराने की गतिविधियां भी कथित रूप से संचालित की जा रही हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र और विभागीय जांच होना जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और यदि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रमाणित होते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।
13-14 साल से पदस्थापना का दावा, विभागीय निगरानी पर भी सवाल
ग्रामीणों ने यह भी दावा किया है कि संबंधित आरएचओ पिछले 13-14 वर्षों से उसी क्षेत्र में पदस्थ हैं और निजी लाभ के कारण पदस्थापना में बदलाव होने के बावजूद पद नहीं छोड़तीं। हालांकि यह शिकायतकर्ताओं का आरोप है, जिसकी आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थापना और सरकारी स्वास्थ्य केंद्र की गतिविधियों की नियमित निगरानी को लेकर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होते हैं।
जांच के बाद ही स्पष्ट होगी वास्तविकता
ग्रामीणों ने कलेक्टर से मामले का तत्काल संज्ञान लेकर उप स्वास्थ्य केंद्र परिसर में संचालित कथित निजी गतिविधियों को बंद कराने और पूरे मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की मांग की है। अब महत्वपूर्ण यह है कि स्वास्थ्य विभाग शिकायत की निष्पक्ष जांच कराए, सरकारी दवाइयों के स्टॉक और वितरण, प्रसव संबंधी रिकॉर्ड, मरीजों से ली गई राशि, शासकीय आवास के उपयोग तथा संबंधित कर्मचारी की पदस्थापना अवधि की जांच करे।ग्रामीण क्षेत्रों में शासन करोड़ों रुपये खर्च कर स्वास्थ्य सुविधाओं और योजनाओं को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में नियमों के उल्लंघन की शिकायत सामने आती है तो विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो कार्रवाई हो और आरोप निराधार मिलते हैं तो तथ्य भी सार्वजनिक किए जाएं ताकि धुर्वाकारी सहित आसपास के ग्रामीणों का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा कायम रह सके।