
भुवनेश्वर बंजारे
बिलासपुर – दिवाली त्योहार से पहले बिलासपुर में खाद्य सुरक्षा मानकों की बड़ी लापरवाही सामने आई है। शहर के शनिचरी बाजार के पास मौत का कारखाना संचालित हो रहा है। जहा शक्कर के बताशे का निर्माण अस्वच्छ परिस्थितियों में किया जा रहा है। धूल और गंदगी से सराबोर इस मौत के कारखाने में जिस जगह पर बताशे बनाए जा रहे हैं, वहां न तो कोई साफ-सफाई है और न ही ढंकने के लिए बर्तन। बताशा बनाने वाले हलवाई और मजदूर चप्पल पहन कर उसी जगह पर आना-जाना कर रहे हैं, जहां बताशा बनाने के लिए चाशनी गिराई जा रही है। यहां तक चाशनी उबालने वाला बर्तन भी साफ नहीं है। जहां मजदूर बताशे की टिक्की बनाने के लिए चाशनी गिरा रहा है, वहां खुद वह चप्पल पहन कर काम करते नजर आ रहे है। बिना दस्ताने के, गंदे हाथों से ही बताशा बनाया जा रहा है और सीधे जमीन पर फेंका जा रहा है। कोई साफ-सफाई नहीं, कोई लाइसेंस नहीं, कोई डर नहीं..! बेखौफ इस मौत के कारखाने को यहां के संचालक अशोक साहू द्वारा विगत कई वर्षों से संचालित किया जा रहा है। स्थानीय जन प्रतिनिधियों,पुलिस और खाद्या विभाग के नाक के नीचे इस उन मुनाफाखोरी के गोरख धंधे को चलाया जा रहा है।
वैसे तो पर्व के दौरान धार्मिक उपयोग में आने वाले खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और शुद्धता के साथ ही सही रखरखाव की जिम्मेदारी व्यापारी को होनी चाहिए। लेकिन, व्यावसायिकता के इस दौर में इसका ख्याल गिने-चुने कारोबारी ही करते हैं। ऐसे में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और उसकी जांच के लिए जिला प्रशासन के खाद्य सुरक्षा विभाग को निगरानी करनी चाहिए। लेकिन, जिले के खाद्य सुरक्षा विभाग के अफसर केवल ऑफिस में बैठकर विभागीय काम-काज कर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। विभाग के अफसर न तो कभी ऐसी जगहों की जांच करने जाते हैं और न ही गुणवत्ता परखने के लिए सैंपल लेते हैं। दीपावली पर्व पर कुछ होटल और मिठाई दुकान में जाकर मिठाइयों का सैंपल लेकर अफसरों ने जांच के लिए भेज खानापूर्ति की जाती है। ऐसे में देखना होगा कि खाद्य सामग्री के नाम पर बीमारी बाट रहे ऐसे कद्दारों के खिलाफ जिला प्रशासन किस तरह एक्शन लेती है।
जमीन पर रेंग रहा है दिवाली का प्रसाद, व्यापार विहार में हो रहा है शुद्धता के नाम पर मेकओवर,
आपके घर तक कैसे पहुंच रहा है ये जहर..!
मौत के कारखाना से बने इस अन हाइजैनिक बताशे को तैयार कर गंदे कार्टून और बोरियो में भरकर व्यापार विहार जैसे बड़े मार्केट में भेजा जाता है। सूत्रों की माने तो यहां इसका मेकओवर होता है। 45 -70 रुपये किलो के इस बताशे को चमकदार पाउच में स्पेशल पूजा बताशा और शुद्ध प्रसाद के नाम से पैक कर 250 से 300 रुपये किलो में इसे शहरवासियों के द्वारा अपने घरों में लाया जाता है। जहा हर घरो में दिवाली की लक्ष्मी पूजा के लिए “शुद्ध प्रसाद” समझकर इसी बताशे को उपयोग में लाया जाता है। जिसके बाद इस जहर को प्रसाद के रूप में सभी खाते है।
खील-बताशे का पौराणिक महत्व को अवसर के रूप में देखते है व्यापारी..!
दीपावली से जुड़ी अनेक मान्यताएं और परंपराएं हैं। ऐसी ही एक परंपरा है दिवाली पूजन में देवी लक्ष्मी को खील-बताशे का भोग लगाना। खील यानी फूला हुआ धान और बताशे यानी चीनी से बने छोटे गोले, दोनों ही समृद्धि और मिठास के प्रतीक हैं। खील को धन और वैभव से जोड़ा गया है, जबकि बताशे को सुख और प्रेम का प्रतीक माना गया है। दिवाली के दिन माता लक्ष्मी को बताशे का भोग लगाना बहुत लाभदायक माना जाता है। इससे देवी प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा परिवार पर बनी रहती है। दिवाली के दिन-रात में जागरण के समय आप बताशे का भोग लगाकर आप उसे प्रसाद के रूप में बांट सकते हैं। साथ ही, इसका संबंध चंद्रमा से होता है। इसके अलावा बताशे का इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है। उसी का फायदा उठाकर अन हाइजैनिक बताशे का उत्पादन धड़ल्ले से किया जा रहा है। जिसपर लगाम लगाने अब तक कोई भी प्रशासनिक तंत्र नजर नहीं आ रहा है।
खाद्य विभाग मौन, जनता परेशान, नियमों को ठेंगा दिखाता हुआ संचालक..!
शहर के बीचों-बीच, मुख्य सड़क से 100 मीटर अंदर चल रहा ये मौत का कारखाना खाद्य विभाग को क्यों नहीं दिखता? आपको जानकर यह हैरानी होगी कि इस मौत के कारखाना का संचालन विगत 7 वर्षों से हो रहा है। जहा ना खाद्य विभाग से कोई परमिशन ली गई है। और ना ही खाद्य विभाग के तय मानकों को ध्यान रखा गया है। कारखाने के संचालन के अनुसार खाद्य विभाग के स्टाफ कभी कभार आते है। और यूं ही चले जाते है..! या यूं कहे अशोक साहू कि जबरदस्त सेटिंग खाद्य विभाग में हो रही है। तभी तो वह डंके की चोट में अन हाइजैनिक बताशे का बेधड़क उत्पाद कर शहरवासियों को परोसने का काम कर रहे है। वही इस मामले में नियमों की बात करे तो खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 31 के तहत बिना लाइसेंस के खाद्य कारोबार करना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद शहर में ऐसे कारखाने का चलना खाद्य विभाग कि लापरवाही का जीता जागता उदाहरण है..