छत्तीसगढ़बिलासपुर

मैकाले की राह पर चलकर बच्चे बन गए बैल ,शिक्षा नीति में आमूल चूल परिवर्तन की दरकार

हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं क्यों? स्कूल जाएंगे, पढ़ेंगे, लिखेंगे, सीखेंगे फिर ऐसा काम करना चुनेंगे जिसमें सबसे ज्यादा पैसा हो

बिलासपुर सतविंदर सिंह अरोरा

कभी बैलों की दौड़ देखी है? घोड़ों को रेस में भागते देखा है? क्या दिखा? बैल भागते दिखे घोड़े भागते दिखे। क्यों भाग रहे हैं न बैलों को पता न घोड़ों को। बस भागना है। क्योंकि ऐसा ही प्रशिक्षण मिला है उनको। यदि वह अपने मालिक की ट्रेनिंग के अनुसार भागेंगे तो घास, चना आदि कुछ अच्छा सा खाने को मिलेगा। यदि नहीं भागेंगे तो डण्डा। और तब तक डण्डा पड़ेगा जब तक कि मालिक के अनुसार भागना आरंभ नहीं कर देते। धीरे भागे तो और डण्डा।

मैं अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने स्वयं जाता हूं। देखता हूं कि कैसे वह व अन्य बच्चे अपने से दुगने वजन का बस्ता कंधों पर डाले लड़खड़ाते अपनी अपनी कक्षाओं की ओर बिना किसी उत्साह के साथ, जैसे किसी नशे में हों, चले जाते हैं। ऐसा लगता जैसे कि जिस तरह जानवरों को नहीं पता क्यों भागना है या यह पता है कि नहीं भागेंगे तो डण्डा और भागेंगे तो खाना मिलेगा, ठीक वैसे से हमारे बच्चे हैं।
हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं। क्यों? स्कूल जाएंगे, पढ़ेंगे, लिखेंगे, सीखेंगे फिर ऐसा काम करना चुनेंगे जिसमें सबसे ज्यादा पैसा हो। कभी भी कोई भी बच्चा किसान बनने, भृत्य बनने, क्लर्क बनने, सिपाही बनने स्कूल जाता है क्या? वह तो इंजीनियर, डॅाक्टर, वकील, जज, कलेक्टर, एसपी आदि आदि ज्यादा ताकत अथवा ‘‘ज्यादा पैसे वाले‘‘ पद को प्राप्त करने का विचार लिए स्कूल जाता है। अब यह विचार उसके मन में कहां से आता है? यह तो हमने ही दिया है। हम शब्द से आशय हम अभिभावक, परिजन व सम्पूर्ण समाज। और आज की तथाकथित शिक्षा को हमने पदोन्मूलक व अर्थोन्मूलक कर दिया है। तभी तो इस शिक्षा व्यवस्था से निकलने के बाद एक व्यक्ति दूसरे को ‘क्या कर रहा है, कितना कमा रहा है आदि से जानता पहचानता है। ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ जैसे सूत्रों से सुशोभित विद्यालयों से पढ़कर निकलने वाले नौनिहाल क्या सचमुच विमुक्त हो पाते हैं?
एक छात्र से मुलाकात हुई। उसने बड़े उत्साह से बताया कि वह आईआईटी से पढ़ाई कर रहा है। मैंने पूछा कि क्या करना है पढ़ने के बाद तो उसका जवाब था कि आईएएस की तैयारी। फिर मैंने पूछा कि आईएएस ही क्यों। जवाब आया अच्छी जॉब है, पैसा है, रूतबा है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी है। फिर बातो ही बातों में यह बात आई कि चलो चपरासी का वेतन कलेक्टर के बराबर कर देते हैं और कलेक्टर का भृत्य समकक्ष। रूतबा और शक्तियां वैसी की वैसी जैसी हैं। ऐसी स्थिति में भी क्या कलेक्टर बनना पसंद करोगे या नहीं। आखिर एक चपरासी कलेक्टर से ज्यादा काम करता है। खड़ा रहता है।पानी पिलाना आदि अत्याधिक शारिरिक श्रम करता है। कम पढ़ा है या कोई प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं किया इसलिए शारिरिक श्रम के कार्य हिस्से में आये। इसलिए शक्ति नहीं, रूतबा नहीं। किन्तु वेतन कलेक्टर से समकक्ष और कलेक्टर का चपरासी के। अब क्या कहना है। उसका जवाब था कि पढ़ाई कर के भी यदि कम कमाई हो तो पढ़ाई क्यों करूं? आपकी क्या राय है?

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