रतनपुर

करैहापारा का मुरलीधर मंदिर: जहां बांसुरी की धुन पर सजे हैं आस्था के फूल… जन्माष्टमी पर उमड़ती है भक्तों की अपार भीड़

जुगनू तंबोली

रतनपुर – छत्तीसगढ़ की पुण्य धार्मिक भूमि रतनपुर के करैहापारा मोहल्ले में स्थित श्री मुरलीधर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास, संस्कृति और आस्था की मिसाल है। यह मंदिर न जाने कितनी पीढ़ियों से लोगों के विश्वास का केंद्र बना हुआ है। यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जो उल्लास और श्रद्धा का वातावरण बनता है, वह किसी बड़े तीर्थ क्षेत्र से कम नहीं।करीब 150-200 वर्ष पूर्व बना यह मंदिर ग्रामीणों की सामूहिक आस्था और श्रम का परिणाम है। कहते हैं कि जब गांव में कोई संकट आता था, तब इसी मंदिर में पूजा-अर्चना कर समाधान की कामना की जाती थी — और चमत्कार भी होते थे। यही कारण है कि यह मंदिर आज भी गांव के हर घर की भक्ति में गहराई से रचा-बसा है। मंदिर में स्थापित श्रीकृष्ण और बलराम की भव्य मूर्तियाँ, जिन पर फूलों की माला और चंदन की खुशबू से वातावरण महकता है, भक्तों को आत्मिक शांति प्रदान करती हैं।

जन्माष्टमी पर सजती है अद्भुत झांकियाँ

हर वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर में सात दिनों तक चलने वाला उत्सव ऐसा होता है मानो स्वयं द्वारका यहां उतर आई हो। मंदिर परिसर दुल्हन की तरह सजता है, रातभर भजन-कीर्तन होते हैं और रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म महाआरती के साथ मनाया जाता है।पुजारी पं. संतोष शर्मा बताते हैं कि जन्मोत्सव की तैयारियां हफ्तों पहले शुरू हो जाती हैं। मंदिर समिति, युवाओं, महिला मंडलों और ग्रामवासियों की सहभागिता इस आयोजन को विशेष बना देती है। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह है जहां दादी-नानी अपने पोते-पोतियों को श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं सुनाती हैं। जहां मन्नतें मांगी जाती हैं, और पूरी होने पर ‘भोग’ व ‘भजन संध्या’ का आयोजन किया जाता है। मंदिर की चौखट पर आकर हर भक्त नत-मस्तक होता है।

पुनर्निर्माण और सेवाभाव से जुड़ी आस्था की डोरी

1998 में मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद इसका स्वरूप और अधिक सुंदर बना। ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के सहयोग से इसके निर्माण में कोई कमी नहीं रखी गई। विशेष बात यह है कि मंदिर में भव्यता होते हुए भी इसका मूल लोक-भाव, सरलता और आत्मीयता आज भी बरकरार है।

करैहापारा का गौरव

करैहापारा का श्री मुरलीधर मंदिर आज सिर्फ एक मंदिर नहीं, गांव के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह मंदिर गांव के अन्य मंदिरों की अपेक्षा एकता, भक्ति और परंपरा का अधिक जीवंत उदाहरण है। यहां आने वाला हर भक्त न केवल श्रीकृष्ण के दर्शन करता है, बल्कि अपने भीतर एक नई ऊर्जा और शांति का अनुभव भी करता है।

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