
उदय सिंह
बिलासपुर – जिले के सिलपहरी औद्योगिक क्षेत्र में संचालित दर्जनों उद्योगों से निकलने वाला धुआं, राखड़ और अन्य औद्योगिक उत्सर्जन अब स्थानीय लोगों के लिए गंभीर परेशानी का कारण बन चुका है। क्षेत्र में स्थित 20 से अधिक फैक्ट्रियों से लगातार फैल रहे प्रदूषण ने आसपास के गांवों की हवा, मिट्टी और पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है। ग्रामीणों का कहना है कि फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाला काला धुआं पूरे इलाके में फैल जाता है, जबकि राख के महीन कण घरों की छतों, आंगनों और खेतों में जम रहे हैं। स्थिति यह है कि लोगों को स्वच्छ हवा तक नसीब नहीं हो रही। ग्रामीणों का आरोप है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार विभागों की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है। प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी कार्यालयों तक सीमित हैं और जमीनी हकीकत जानने के लिए क्षेत्र का नियमित निरीक्षण भी नहीं करते।
कारखानों से उगलती गंदगी, पर्यावरण पर भारी संकट
औद्योगिक क्षेत्र की 20 से अधिक इकाइयों से लगातार धुआं और राख का उत्सर्जन हो रहा है, आसपास के गांवों में वायु गुणवत्ता पर गंभीर असर हुआ है। खेतों और आवासीय क्षेत्रों तक राख पहुंच रही है। ग्रामीणों में सांस, आंख और त्वचा संबंधी समस्याओं की शिकायतें बढ़ीं है जो पर्यावरणीय मानकों के पालन पर गंभीर सवाल खड़ी कर रही है। नियमों के अनुसार किसी भी उद्योग को स्थापना और संचालन से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करनी होती है। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए आधुनिक उपकरण लगाना और निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई उद्योग इन नियमों को दरकिनार कर मनमाने ढंग से संचालन कर रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका प्रभाव केवल वर्तमान पीढ़ी ही नहीं बल्कि आने वाले वर्षों तक क्षेत्र की पारिस्थितिकी और जनस्वास्थ्य पर पड़ेगा। कृषि भूमि की उत्पादकता प्रभावित होने के साथ भूजल और जैव विविधता पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
एसी कमरों में औपचारिकता, मैदान में नहीं दिखती निगरानी
ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित विभागों के अधिकारी केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित हैं। औद्योगिक क्षेत्रों की नियमित मॉनिटरिंग और निरीक्षण के दावे किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में मौके पर पहुंचकर जांच करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। जिले के कई शहरी क्षेत्रों, राइस मिलों और औद्योगिक इकाइयों से भी मानक से अधिक प्रदूषण निकलने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं पूरी होती दिखाई देती हैं।
एनजीटी के नियमों को दिखाया जा रहा ठेंगा
पर्यावरण कानूनों के जानकारों के अनुसार यदि किसी क्षेत्र में वायु प्रदूषण निर्धारित सीमा से अधिक पाया जाता है तो मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण के दायरे में आता है। एनजीटी को पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने वाले उद्योगों पर भारी जुर्माना लगाने, क्षतिपूर्ति वसूलने और आवश्यक होने पर संचालन बंद कराने तक के अधिकार प्राप्त हैं। इसके बावजूद सिलपहरी औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब तक कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। क्षेत्रवासियों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से मांग की है कि सिलपहरी औद्योगिक क्षेत्र का तत्काल संयुक्त निरीक्षण कराया जाए। साथ ही प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की जवाबदेही तय कर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि क्षेत्र को संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट से बचाया जा सके। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो सिलपहरी का यह औद्योगिक प्रदूषण आने वाले दिनों में पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर जनस्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का रूप ले सकता है।
गोकने से होकर अरपा में पहुंच रहा औद्योगिक प्रदूषित पानी
सिलपहरी और आसपास संचालित उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषित पानी बड़े नालों के माध्यम से गांवों के बीच से गुजरते हुए अंततः अरपा नदी में मिल रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह दूषित पानी पर्यावरण के साथ-साथ ग्रामीणों के स्वास्थ्य और पशुधन के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। नालों से उठने वाली दुर्गंध के कारण ग्रामीणों का घरों में रहना तक मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों के अनुसार गोकने नाला के माध्यम से बहने वाला यह गंदा पानी कोरमी, बसिया, बनाकडीह, नगपुरा, सिरगिट्टी, सिलपहरी जैसे गांवों को प्रभावित कर रहा है। नालों में लगातार बह रहे रासायनिक मिश्रित पानी से आसपास का वातावरण प्रदूषित हो रहा है, वहीं खेतों और जलस्रोतों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रदूषित जल के बहाव पर रोक नहीं लगाई गई, तो अरपा नदी का प्रदूषण स्तर और बढ़ेगा तथा इसका असर पूरे क्षेत्र के पर्यावरण और जनजीवन पर पड़ेगा।