
रमेश राजपूत
मुंगेली – जिले में सरकारी आयोजनों की व्यवस्था अब नियमों से नहीं, बल्कि कथित तौर पर कद्दावर नेता जी की करीबी से तय हो रही है। शासकीय कार्यक्रमों में टेंट सहित अन्य व्यवस्थाओं के लिए टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार कर चहेतों को काम देने का मामला सामने आया है। इससे वर्षों से टेंट व्यवसाय में अपनी पहचान बनाने वाले स्थानीय कारोबारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले में आयोजित होने वाले विभिन्न शासकीय कार्यक्रमों और समारोहों में टेंट, कुर्सी, टेबल, मंच सहित अन्य व्यवस्थाओं के लिए पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाने के बजाय कथित तौर पर नेता जी के करीबियों को काम सौंप दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को काम दिया जा रहा है, उनके पास खुद की टेंट सामग्री और आवश्यक संसाधन तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में वे स्थानीय टेंट व्यवसायियों से किराए पर सामान लेकर आयोजन की व्यवस्था पूरी करवाते हैं।
काम का ठेका किसी और के नाम, मेहनत और सामान स्थानीय कारोबारियों का!
स्थानीय व्यवसायियों का आरोप है कि काम पूरा होने के बाद उन्हें भुगतान भी पूरी तरह नहीं किया जाता। ऐसे में ठेकेदारों की बल्ले-बल्ले और वास्तविक काम करने वाले कारोबारियों की हालत बदहाल बनी हुई है। वर्षों से व्यवसाय में निवेश कर रोजगार देने वाले कारोबारी अब सरकारी आयोजनों में काम मिलने की उम्मीद में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
नियमों की किताब बंद, करीबियों के लिए रास्ते खुले?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदार विभागों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। यदि सरकारी आयोजनों में टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य है, तो उसका पालन क्यों नहीं हो रहा? आखिर किस आधार पर चुनिंदा लोगों को काम सौंपा जा रहा है? क्या सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा की जगह राजनीतिक रसूख ने ले ली है?
टेंट कारोबारियों में इस कथित मनमानी को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर टेंडर प्रक्रिया की जांच कराता है या फिर सरकारी आयोजनों में ‘नेता जी के करीबी’ होने का विशेषाधिकार यूं ही चलता रहेगा।